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चौपालः छवि को क्षति

यह सर्वविदित है कि खुशहाली किसी भी इंसान के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि खुशियों के बिना जिंदगी अधूरी कही जाती है। मगर हम भारतीय कितने खुश हैं?

Author Published on: April 4, 2019 3:45 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर ( फोटो- एपी)

यह सर्वविदित है कि खुशहाली किसी भी इंसान के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि खुशियों के बिना जिंदगी अधूरी कही जाती है। मगर हम भारतीय कितने खुश हैं? हाल ही में जारी वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक-2019 की 156 देशों की सूची में भारत को 140 वां स्थान मिला है और यह पिछले वर्ष की तुलना में सात पायदान नीचे है। यही नहीं, हमारी उदासी का आलम यह है कि अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी इस मामले में हम काफी पीछे हैं। इस सूची में पाकिस्तान अपनी रैंकिंग में पिछले साल से सुधार करते हुए 75 वें स्थान से 67 वें पर आ गया है। यहां विचारणीय है कि स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, आजादी और भ्रष्टाचार की समाप्ति जैसे छह पैमानों को ध्यान में रख कर तैयार की जाने वाली इस सूची में हम लगातार पिछड़ क्यों रहे हैं?
कहीं हम राजनीतिक और सांप्रदायिक द्वेष में सुलग कर उग्र तो नहीं होते जा रहे हैं! यह सवाल इसलिए कि जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति की हत्या, सांप्रदायिक झड़पें या तो बढ़ी हैं या ज्यादा प्रकाश में लाई गई हैं उससे देश की छवि को क्षति तो जरूर पहुंची है। जब ऐसे ही मुद्दे वैश्विक पटल पर अपनी जगह बनाते हैं तो हमें एक बेचैन और बदहवास राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है क्योंकि छोटी-सी बुराई भी तमाम अच्छाइयों पर परदा डाल देती है। हमारे अंदर निम्न स्तर का आपसी राजनीतिक प्रतिशोध, क्रोध और उग्रता जरूरत से ज्यादा घर कर गए हैं जिन्हें निकाल फेंकने की जरूरत है।
अब जबकि आम चुनाव सामने है और लोगों की खुशहाली किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में दूर-दूर तक नहीं है, 130 करोड़ आबादी वाले इस देश को यहां की फिजाओं में खुशियां घोलने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर कम से कम भारत को एक खुशहाल राष्ट्र का दर्जा तो दिलाना ही चाहिए।
’संजय दूबे, नई दिल्ली

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