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चौपालः खेती का संकट

अभी टनों प्याज सड़ने और किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम नहीं मिलने की खबरें ठंडी भी नहीं पड़ी हैं कि प्याज की कीमतों के आसमान छूने के समाचार सुर्ख हो रहे हैं।
Author August 11, 2017 03:04 am

अभी टनों प्याज सड़ने और किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम नहीं मिलने की खबरें ठंडी भी नहीं पड़ी हैं कि प्याज की कीमतों के आसमान छूने के समाचार सुर्ख हो रहे हैं। पिछले महीने मध्यप्रदेश में प्याज को दो रुपए किलो का भाव नहीं मिल रहा था, आज पच्चीस-तीस में लेना पड़ रहा है। कारणों का विस्तार-मंथन कर लें तो अंत में कृषि कुप्रबंधन की बात सामने आती है। पिछले साठ-सत्तर वर्षों में कृषि में बहुत सुधार हुआ है। मशीनों का प्रयोग सुगम होने से मानव श्रम में भी राहत है। फिर क्या कारण है कि किसान परेशानी महसूस कर रहे हैं?

जरा गौर करें तो पाएंगे कि कुप्रबंधन के अलावा भारतीय किसान की समस्या केवल उत्पादन और बाजार भाव को लेकर नहीं है। वह गैर-कृषि कर्ज, ब्याज, विवाह-मृत्युभोज, मुकदमेबाजी और इन जैसे तमाम खर्चीले आडंबरों और दिक्कतों में इतना धंसा हुआ है कि उसे कोई रास्ता नहीं सूझता है। आज का किसान पढ़ा तो है लेकिन परंपराओं-आडंबरों की जंजीर तोड़ने में सक्षम नहीं है जिससे नई सोच के लिए उचित स्थान नहीं बन पाता है। उसकी आर्थिक समस्याएं परोक्ष रूप से सामाजिक पिछड़ेपन से प्रेरित दिखाई देती हैं। सरकारी नीतियों पर हम सबका ध्यान जाता है। पिछले वर्षों में जब प्याज कम बोया गया या उसका उत्पादन कम हुआ तब उसकी कीमत पचास-साठ रुपए किलो से भी अधिक हो गई थी।
किसानों ने ऐसा समय भी देखा है जब लहसुन की तीन-चार बोरियां मंडी में बेच कर लौटते हुए मनपसंद बाइक खरीद कर ले गए थे। सोयाबीन, गेहूं, चना आदि फसलों में भी तेजी का लाभ मिलता रहा है। यहां चूक यह होती है कि जिस फसल के दाम बढ़ कर मिलते हैं अगले सीजन में ज्यादातर किसान उसे ही बोते हैं। नतीजा, अधिक उत्पादन के रूप में सामने आता है। मांग से अधिक पूर्ति के कारण उपज के सही दाम नहीं मिलते हैं।

फिर समाधान क्या हो सकता है! देखें कि इतनी बड़ी कृषि आश्रित जनसंख्या के लिए कोई उल्लेखनीय कृषि-अखबार, मानक-पत्रिका या अन्य मार्गदर्शक साधन उपलब्ध नहीं हैं जो बताएं कि देश के कुल रकबे में कितने पर क्या बोना है ताकि पैदावार और मांग में संतुलन बने। टीवी के कृषि चैनल हैं और उन पर मौसम की जानकारी के अलावा कुछ और बातें भी बताई जाती हैं लेकिन वे क्षेत्रीय स्तर की अधिक होती हैं। दैनिक अखबार हो तो उसमें देश भर की मंडियों के भाव, रकबों की जानकारी, नए उपकरण, दवाएं, नई तकनीक, मानव श्रम की उपलब्धता, कृषि योजनाओं के संबंध में विमर्श आदि किसान के लिए उपयोगी हो सकता है। यही नहीं, इसमें स्वास्थ्य, सफाई, खानपान आदि के संबंध में भी जानकारी देकर सामाजिक शिक्षण का काम आसानी से किया जा सकता है। दिखावे, आडंबर, फिजूलखर्ची पर उनकी सोच बदलने की बहुत जरूरत है।
’जवाहर चौधरी, कौशल्या पुरी, इंदौर

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