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चौपाल: विषमता का विकास

प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था कि यहां सभी लोग संपन्न थे। उस समय साझा अर्थव्यवस्था होती थी और सभी को फलने- फूलने के उचित अवसर मिलते थे।

Author October 31, 2018 6:14 AM

ऑक्सफैम की रिपोर्ट साफ-साफ दर्शाती है कि हमारे यहां आर्थिक असमानता आज चरम पर है और ज्यादातर विकासशील देश इस समस्या से ग्रस्त हैं। दरअसल, आज पूंजीवादी व्यवस्था कुछ ऐसा रूप ले चुकी है कि साधन संपन्न लोग और अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और अधिक गरीब। इस व्यवस्था में पहले वस्तुएं उत्पादित की जाती हैं और फिर लोगों के भीतर उनकी जरूरतें पैदा की जाती हैं। इन्हीं वस्तुओं की लालसाएं आज हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। अमीर लोग इसी का फायदा उठा कर वह पूंजी भी सोख लेते हैं जो थोड़ी-बहुत मात्रा में निम्न और मध्य वर्ग के पास होती है। इन पूंजीवादी कौरवों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है कि आम मनुष्य उसमें फंसे बगैर नहीं रह सकता है।

प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था कि यहां सभी लोग संपन्न थे। उस समय साझा अर्थव्यवस्था होती थी और सभी को फलने- फूलने के उचित अवसर मिलते थे। मौर्य काल में तो सम्राट अशोक ने कर की अधिकतम दर दस प्रतिशत रखी हुई थी। अलाउद्दीन खिलजी ने भी बाजार नियंत्रण बहुत सख्त किया था ताकि कोई भी सामान उसके निर्धारित मूल्य से अधिक पर न बेचा जाए। लेकिन औपनिवेशिक काल में इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का भारत पर सीधा असर पड़ा और हमारे वे सभी उद्योग धंधे एक-एक करके बंद होते चले गए जो निम्न और मध्य वर्ग में आय का एकसमान वितरण करने में अत्यंत सहायक होते थे।

आजादी के तुरंत बाद गांधीजी ने शायद इसी को ध्यान में रखते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों पर बल देने को कहा था लेकिन इसके उलट नेहरूजी ने भारी उद्योगों को बढ़ावा दिया। इससे देश की अर्थव्यवस्था में तो निश्चित रूप से वृद्धि हुई लेकिन इस उत्पादित पूंजी का समान वितरण करने में हमारी सरकारों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और इससे गरीब तबका हाशिये पर चला गया। आज भले ही भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका हो लेकिन यह भी कटु सत्य है कि संख्या के हिसाब से सर्वाधिक गरीब लोग भी भारत में ही बसते हैं। इसके मद्देनजर सरकार को जल्दी ही आर्थिक असमानता दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
’सचिन पंवार, ग्रेटर नोएडा

पिछड़ते हम

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक देश में अप्रैल 2020 से बीएस 4 वाहन नहीं बिकेंगे। इस संदर्भ में उल्लेख किया गया है कि यूरोप में 2015 में यूरो 6 मानक लागू हो गया था, जबकि भारत में बीएस-4 मानक अप्रैल 2017 में लागू हो पाया। इसी तरह इंटरनेट के क्षेत्र में हम अभी 4 जी पर ही अटके हुए हैं जबकि जापान सहित कई देशों ने 7 जी नेटवर्क का परीक्षण भी शुरू कर दिया है। हमारा देश वोट की राजनीति, फालतू के लड़ाई-झगड़ों, उन्माद व हिंसा के मामले में आगे बढ़ रहा है जबकि हम तकनीक के मामले में आज भी काफी पीछे चल रहे हैं।

‘अच्छे दिन आएंगे’ की उम्मीद पाले बैठे देश के लिए बहुत विकट स्थिति है। आगे बढ़ने के लिए सभी सियासी पार्टियों व देश के नागरिकों को बेमतलब के मुद्दों को त्यागना ही होगा। सबसे ज्यादा जरूरत तो वोट की राजनीति करने वाले सियासी दलों को सबक सिखाने की है। वोट के चक्कर में वे लोगों को लड़ाते रहते हैं। अगर वे इतनी कवायद देश, जनहित व तकनीकी विकास के मुद्दों पर करें तो हम अन्य मुल्कों के लिए मिसाल कायम कर सकते हैं।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

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