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चौपाल: छोटा बड़ा, रंजिश का अखाड़ा, हिंसा का मानस

विचारो में अंतर होना लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छी बात होती है, क्योंकि इससे समाज को तरह-तरह की सोच मिलती है जो समाज के विकास के लिए बहुत लाभदायक है।

Author February 28, 2017 6:05 AM
रामजस कॉलेज में आईसा और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच व्यापक हिंसा भड़क उठी थी।

छोटा बड़ा
समय कीमती है और अमूल्य भी। कहा जाता है कि समय के साथ चलना चाहिए, तभी तरक्की संभव है। तरक्की चाहे खुद की हो या समाज की या फिर देश की। लेकिन सच यह है कि समय के साथ तो हम चल रहे हैं, लेकिन अपनी मानसिकता को नहीं बदल पा रहे हैं। आज भी हम पद को ज्यादा महत्त्व देते हैं, कार्य को नहीं। अगर कोई होटल का गार्ड या फिर किसी आॅफिस में काम करने वाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हमें अभिवादन करता है तो बिना उसकी बात का जवाब दिए या तो उसे कार की चाबी पकड़ा दी जाती है या फिर उसे चाय या कॉफी लाने का आॅर्डर दे दिया जाता है।

आज भी कई घरों में जब कोई सफाई करने वाला व्यक्ति एक गिलास पानी का मांग लेता है तो उस गिलास को अलग रखा जाता हैं। क्यों हम भूल जाते हैं कि ये सब भी काम है जो हमारे लिए किए जाते हैं। अगर सफाई कर्मचारी की जगह सड़कों और नालियों को साफ रखने का काम हमें करना पड़े तो भी क्या हम ऐसे व्यवहार का समर्थन करेंगे? कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कहीं न कहीं इस बात को जानते हम सब हैं, पर इसको मानना कोई नहीं चाहता। बस हमारी मानसिकता ही काम और उसे करने वाले व्यक्ति को छोटा-बड़ा बना देती है। यह भी एक बड़ी वजह है बेराजगारी की कि हमारे नौजवान कई वैसे कार्यों को करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं जो उन्हें छोटे लगते हैं। जबकि कई बार छोटे कहे जाने वाले काम भी बड़े मुकाम तक पहुंचा देते हैं।
’नीतू शर्मा, जयपुर

हिंसा का मानस
विचारो में अंतर होना लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छी बात होती है, क्योंकि इससे समाज को तरह-तरह की सोच मिलती है जो समाज के विकास के लिए बहुत लाभदायक है। लेकिन विचारों का मतभेद होने पर हिंसा समाज में तनाव को बढ़ा देता है जो समाज के विकास को रोकता है, जिससे समाज में तनाव का माहौल बना रहता है। विचारो को लेकर हुए मतभेद से दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में तनाव का माहौल बना जो एक सेमिनार से शुरू होकर कई विद्यार्थी, अध्यापक और देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस तक पहुंचा। विचारों में मतभेद बहुत अच्छी बात है, पर उसे लेकर पढ़े-लिखे युवाओं का हिंसा पर उतर जाना देश के लिए घातक है। इस हिंसा में गुरु-शिष्य परंपरा तक को अनदेखा कर दिया गया। यह हमारे समाज के लिए खतरा है।
’रोहित यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय
रंजिश का अखाड़ा
बीते कुछ सालों से राजनीति विकास के मुद्दों के इतर चुनावी रंजिश का अखाड़ा ज्यादा नजर आती है। जानवरों की उपमाओं से विरोधियों पर तंज कसने के रूप में भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय का प्रारम्भ हुआ है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की और से ‘गधे’ की टिप्पणी की गई। नोटबंदी जैसे गंभीर मुद्दे पर शांत रहे मोदी ने इसके जवाब में खुद के मेहनतकश होने की बात को साबित करना चाहा तो कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने अपने विवादित बयान से मामले को और तूल दे दिया। गाय के मसले पर मुखर होने वाले अब गाय को भूल कर गधे को अच्छा परिश्रमी और शांतप्रिय जानवर के रूप में महिमामंडन में लगे हैं। ऐसे में नेताओं के वरिष्ठ होने पर संदेह उठता है। क्या ये उसी भारत की ओर जा रहे हैं, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने सपने देखे थे और खुद को हमारे लिए बलिदान किया था। और कुछ हो न हो, आगामी पीढ़ियां इस समय को भारतीय लोकतंत्र के भाषायी मर्यादा के एक अफसोसनाक काल के रूप में अवश्य याद रखेंगी।
’चंद्रकांत, एएमयू

 

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