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चौपालः वक्त की मांग

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का ईरान के साथ परमाणु समझौते से पीछे हटना वैश्विक प्रतिबद्धता से पीछे हटना है। जब कोई करार दो या अधिक देशों के बीच होता है तो उसकी विश्वसनीयता सभी पक्षों द्वारा उसकी मान्यता पर निर्भर करती है।

Author May 28, 2018 05:28 am
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फाइल फोटो)

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का ईरान के साथ परमाणु समझौते से पीछे हटना वैश्विक प्रतिबद्धता से पीछे हटना है। जब कोई करार दो या अधिक देशों के बीच होता है तो उसकी विश्वसनीयता सभी पक्षों द्वारा उसकी मान्यता पर निर्भर करती है। किए गए वादे पर टिके रहना आपके पक्ष को मजबूती तो देता ही है, वैश्विक स्तर पर आप एक मिसाल भी पेश करते हैं। पूरी दुनिया आज राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। चीन और रूस में सत्ता का अधिनायकवादी स्वरूप देखने को मिल रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप में व्यावहारिक अस्थिरता और अपरिपक्वता दिखाई पड़ती है और उनकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगे हैं। उधर उत्तर कोरिया के रुख में कुछ नरमी दिखाई दी है, मगर देखना दिलचस्प होगा कि यह नरमी किसी चाल से प्रेरित न हो।

जनतांत्रिक व्यवस्था में बहस-मुबाहिसे का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सदन चर्चा के लिए है पर उसकी भी आत्मा शोरशराबे और हंगामे में कैद होकर कसमसाती रहती है। पड़ोसी पाकिस्तान राजनीतिक उठापटक के दौर से गुजर रहा है। इन तमाम उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां आने वाले समय में गंभीर संकट के उभरने का संकेत हैं। इस वैश्विक परिदृश्य में भारत की तटस्थता समय की मांग है। हमारी ज्यादातर आबादी युवा है और अब महज ‘सवा सौ करोड़ का यह देश’ कहने से काम नहीं चलने वाला। इसके विकास की दिशा में हमें और ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है। हमें सारी ऊर्जा शोध और तकनीक के विकास पर केंद्रित करनी चाहिए। शोध संस्थानों के हालात सुधारने चाहिए।

देश में परियोजनाओं की लागत कम करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के कारण लागत खर्च बढ़ता है। लिहाजा, परियोजनाओं की अधिक अनुमानित लागत तय करने की संस्कृति समाप्त करनी होगी। सभी योजनाएं समय पर पूरी हों ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बहुत जरूरी है। चीन की चुनौती का जवाब बड़ी-बड़ी बातों से देना सिर्फ सुर्खियां बटोरना होगा। न्यायिक व्यवस्था और चुनाव सुधार बदलते वक्त की मांग हैं। इस दिशा में भी आगे बढ़ने की आवश्यकता है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाना चाहिए। देश की सारी संस्थाएं अपनी स्वायत्तता के दायरे में रह कर एक इकाई के रूप में कार्य करें। हमें उस प्रतियोगिता को हर हाल में जीतना ही होगा जिसमें हम प्रतिद्वंद्वी से पीछे हो चुके हैं और इसके लिए बहुत मेहनत लगेगी।

अमरजीत कुमार, अंडाल, दुर्गापुर, प. बंगाल

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