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चौपालः समय पर रेल

समय पर रेल समय को मूल्यवान कहा जाता है लेकिन लगता है, रेलवे की नजरों में उसकी कोई कीमत नहीं है। इसीलिए आजादी के सत्तर साल बाद भी ट्रेनों की लेटलतीफी निरंतर जारी है। उनके गंतव्य पर समय से न पहुंचने के कारण लोगों को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है। कोई साक्षात्कार या परीक्षा […]

Author May 17, 2018 05:08 am
भारतीय रेलवे (image source-Express photo)

समय पर रेल

समय को मूल्यवान कहा जाता है लेकिन लगता है, रेलवे की नजरों में उसकी कोई कीमत नहीं है। इसीलिए आजादी के सत्तर साल बाद भी ट्रेनों की लेटलतीफी निरंतर जारी है। उनके गंतव्य पर समय से न पहुंचने के कारण लोगों को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है। कोई साक्षात्कार या परीक्षा देने, किसी के खुशी अथवा गम में शामिल होने के लिए रेलगाड़ी से जाता है तो लेटलतीफी के चलते निर्धारित समय पर नहीं पहुंच पाता। नतीजतन, उसे ऐसा खमियाजा भुगतना पड़ता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। कई बार देखा गया है कि महज पंद्रह से बीस किलोमीटर की दूरी तय करने में भी ट्रेनों को घंटों लग जाते हैं। आज भारतीय रेलवे जनता को अनेक प्रकार की सुविधाएं देने के दावे करता है, लेकिन उसे सबसे पहले ट्रेनों का समयबद्ध परिचालन सुनिश्चित करना चाहिए।

अमित पांडेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

सबक कब

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल के नीचे पलक झपकते ही हंसती खेलती जिंदगियां हमेशा के लिए शांत हो गर्इं। मौत का ऐसा जलजला कि देख कर रूह कांप उठे! इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?सफेदपोश लोग और नौकरशाह इसे प्राकृतिक आपदा बता कर तो पल्ला झाड़ नहीं सकते। यह सौ फीसद मानवीय गलती है। ऐसी दुखद और भयावह घटनाएं पहले भी हुई हैं, उनसे हमने कितने सबक सीखे?

सबसे गंदा और भद्दा तो तब लगता है जब ऐसी भयावह घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया पर बयानबाजी होती है। लोग इन हादसों की तुलना सरकारों के कार्यकालों से करने लगते हैं, यह अंधभक्तिकी पराकाष्ठा है। यह बात पता नहीं लोग कब समझेंगे कि मनुष्य की जिंदगी सरकार के कार्यकाल से कहीं ज्यादा कीमती है।

मुलायम सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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