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चौपालः लोकपाल की शक्तियां

भारत के राष्ट्रपति ने न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के आने के लगभग पांच साल बाद लोकपाल का गठन हो पाया।

भारत के राष्ट्रपति ने न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया है।

भारत के राष्ट्रपति ने न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के आने के लगभग पांच साल बाद लोकपाल का गठन हो पाया। भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 और लोकपाल के व्यावहारिक गठन, दोनों के लिए ही राजनीतिक इच्छाशक्ति का भारी अभाव रहा। व्यापक आंदोलन के बाद वर्ष 2013 में अधिनियम आया और संसद ने उसमें भी कई बार संशोधन किए, किंतु अंत में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद लोकपाल का गठन हो पाया।

जाहिर है, राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी भी संस्था की सफलता के लिए धुरी का कार्य करती है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के आने के बाद विभिन्न राज्यों ने लोकायुक्तों का गठन किया, किंतु अभी तक संबंधित राज्यों में भ्रष्टाचार में कमी नहीं आई है। बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों या मंत्रियों द्वारा भ्रष्टाचार में कमी आने की बात तो दूर, बल्कि इनके भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी हुई है।

केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए सीबीआइ, सीवीसी, ईडी जैसी एजेंसियां तो हैं और न्यायालय भी इसमें अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार देश के प्रशासनिक ढांचे में जड़ जमाए बैठा है। इस स्थिति में लोकपाल से बहुत ज्यादा उम्मीद उचित प्रतीत नहीं होती है। इसके अलावा अन्य भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं की तरह लोकपाल को भी पर्याप्त शक्तियां नही दी गई हैं जिससे यह व्यावहारिक धरातल पर दंतहीन-नखहीन व्याघ्र और विषहीन सर्प की तरह साबित हो सकता है।
’वीर सिंह, जालौन

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