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चौपालः आतंक की बिसात

कश्मीर घाटी में पिछले कुछ महीनों से हालांकि आतंकी हमलों में तेजी आई है, मगर उसी रफ्तार से आतंकवादियों और जिहादियों का खात्मा भी किया जा रहा है।

Author May 15, 2018 4:06 AM
कश्मीरियों, विशेष रूप से कश्मीरी युवाओं को इन स्वार्थी, छद्म और आत्म-प्रचार में लिप्त अलगाववादी नेताओं की चाल को समझना चाहिए और कश्मीरी समाज की मुख्यधारा में खुद को शामिल करना चाहिए।

कश्मीर घाटी में पिछले कुछ महीनों से हालांकि आतंकी हमलों में तेजी आई है, मगर उसी रफ्तार से आतंकवादियों और जिहादियों का खात्मा भी किया जा रहा है। सीमा पर अत्यधिक चौकसी के कारण पाकिस्तान से आतंकियों की घुसपैठ में कमी तो आई है मगर आतंकी संगठन स्थानीय तौर पर अब युवाओं को बरगला कर अपने संगठन में शामिल करने के लिए बराबर प्रयासरत हैं। बेरोजगार युवकों को धन और अन्य सुविधाओं का प्रलोभन देकर आतंकी गतिविधियां अंजाम देने के लिए प्रेरित किया जाता है। अपने आकाओं के कहने पर गुमराह हो रहे ये युवक सबकुछ दांव पर लगा तो देते हैं, मगर कभी अपने मन से यह नहीं पूछते कि यह हिंसा क्यों और किसके लिए कर रहे हैं? कश्मीरी युवा सुरक्षा बलों को ज्यादतियों के लिए दोषी ठहराते हैं, लेकिन वे कभी भी अलगाववादी समूहों के शीर्ष नेताओं से यह सवाल नहीं करते कि उनके खुद के बच्चे ‘आजादी’ के इस कथित जिहाद में क्योंकर शामिल नहीं होते?

पिछले साल जुलाई में सुरक्षा बलों ने हिजबुल मुजाहिदीन के एरिया कमांडर बुरहान वानी को मार गिराया। नतीजतन, घाटी में कश्मीरियों ने बड़े पैमाने पर नाराजगी और विरोध जताया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में वानी के कई समर्थकों की मौत हुई और सुरक्षा बलों के कुछ जवान हताहत भी हुए थे। वानी कई सुरक्षा कर्मियों की हत्याओं के साथ-साथ कश्मीर के कुछ अन्य निर्दोष लोगों की हत्या के लिए भी दोषी एक खतरनाक और ‘मोस्ट वांटेड’ आतंकवादी था जिसे अपने किए का दंड मिल गया।

इसी महीने सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हिजबुल मुजाहिदीन के अन्य कमांडर आकिब खान और समीर टाइगर को मार गिराया। इन आतंकियों में से समीर टाइगर अति खूंखार दरजे का था और लंबे समय से सुरक्षा बलों को उसकी तलाश थी। सुरक्षा बलों ने एक सर्च ऑपरेशन के दौरान समीर टाइगर को घेर लिया। 2016 में बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद से समीर टाइगर घाटी में आतंकियों का पोस्टर ब्वॉय बन गया था। उसने एक धमकी भरा वीडियो जारी किया था जिसमें कहा था, ‘शुक्ला को कहना शेर ने शिकार करना क्या छोड़ा, कुत्तों ने समझा जंगल हमारा है…अगर उसने अपनी मां का दूध पिया है ना तो उसको कहो सामने आ जाए।’

फिल्मी अंदाज में कहे इस डायलॉग की कीमत टाइगर को चुकानी पड़ी। उसे भारतीय सेना के मेजर रोहित शुक्ला की बहादुरी और कर्तव्य-निष्ठा ही कहेंगे कि उन्हें खुलेआम चुनौती देने वाला दहशतगर्द को विडियो जारी करने के एक दिन के अंदर-अंदर ही मार गिराया गया।

कश्मीर के इन गुमराह युवाओं को अपने नेताओं से पूछने की जरूरत है कि क्यों उनकी बेटियां और बेटे विदेशों में या अन्य जगहों पर आरामदायक जीवन बिता रहे हैं, जबकि घाटी में इन गुमराहों ने बेवजह ही बंदूकें उठा रखी हैं और बेमतलब युद्ध कर रहे हैं और मारे जा रहे हैं। कोई भी इन चतुर और घाघ अलगाववादी नेताओं से नहीं पूछता है कि बुरहान और समीर उनके अपने परिवार से क्यों नहीं थे? असल में, ये अलगाववादी नेता इन निर्दोष और भटके हुए युवाओं के खून पर अपनी राजनीति चमकाते हैं और सौदेबाजी कर कमाते-खाते हैं। खुद तो पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं और इन मासूम युवा-कश्मीरियों को भारतीय सेना का सामना करने के लिए धकेल देते हैं। दूसरे शब्दों में, शेरों से लड़ने के लिए मेमनों को बलि पर चढ़ाया जाता है ।

कश्मीरियों, विशेष रूप से कश्मीरी युवाओं को इन स्वार्थी, छद्म और आत्म-प्रचार में लिप्त अलगाववादी नेताओं की चाल को समझना चाहिए और कश्मीरी समाज की मुख्यधारा में खुद को शामिल करना चाहिए। ‘कश्मीरियत’ से बढ़ कर यह मुख्यधारा और कुछ नहीं हो सकती। सहिष्णुता, बंधुता, इंसानियत और करुणा इस धारा के मुख्य आधार हैं।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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