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चौपालः प्रदूषण के पीछे

पुरानी गलतियों से सीख कर अब भी हालात बदले जा सकते हैं। अगर हम दृढ़ निश्चय कर लें कि प्रदूषण को किसी भी हाल में नहीं बढ़ने देंगे तो तय है कि अनुकूल परिणाम निकलेंगे।

Author May 14, 2018 4:16 AM
प्रतीकात्मक चित्र

प्रदूषण के पीछे

दो अक्तूबर 2014 को गांधी जयंती पर प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। उसके साथ ‘प्रदूषण मुक्त भारत अभियान’ जैसी कोई योजना भी शुरू की जानी चाहिए थी। हमारे देश में सरकारें भले ही अपने मुंह मियां मिट्ठू बनें कि उन्होंने प्रदूषण रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए हैं लेकिन उनकी कथनी और करनी में दूर-दूर तक संबंध नहीं दिखता। आज विश्व के पंद्रह सबसे प्रदूषित शहरों में चौदह अकेले भारत के ही हैं। आखिर जब योजनाएं बनाई गर्इं, अभियान शुरू किए गए, नीतियां बनाई गर्इं तब भी प्रदूषण रुक क्यों नहीं पाया? क्या व्यवस्था नाकाम हुई या नीतियां?

शायद अब पीछे मुड़ कर देखने से भी कुछ मिलने वाला नहीं है। लेकिन सवालों की फौज तो खड़ी होगी ही जब तक कि सूरत-ए-हाल नहीं सुधर जाते। हमें जरूर उन पहलुओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिनके कारण प्रदूषण रोकने या कम करने में विफल हुए हैं। इसमें शक नहीं कि देश की जनता भी प्रदूषण के लिए उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि सरकारी तंत्र। हम लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का भरपूर शोषण कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषण इतना गहरा गया है। बहरहाल, सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। अर्थात, पुरानी गलतियों से सीख कर अब भी हालात बदले जा सकते हैं। अगर हम दृढ़ निश्चय कर लें कि प्रदूषण को किसी भी हाल में नहीं बढ़ने देंगे तो तय है कि अनुकूल परिणाम निकलेंगे।

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शिवेंद्र तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय

बेहतर विकल्प

जब हम चेहरा धोने के लिए ‘वाश बेसिन’ पर जाते हैं तो अकसर नल खोल देते हैं जिससे पानी की बहुत बर्बादी होती है। अगर हम एक मग में पानी भरें और उससे अपना चेहरा धोएं तो तीन लीटर पानी बचा सकते हैं। एक परिवार में यदि पांच सदस्य हैं तो इस प्रकार वे पंद्रह लीटर पानी बचा सकते हैं। इस मामूली तरीके से दिल्ली के 22 लाख परिवार 330 लाख लीटर पानी बचा सकते हैं। ऐसे ही स्नान करते वक्त जब हम बदन पर साबुन मलते हैं तो नल बंद करना न भूलें। वैसे बाल्टी में पानी भर कर नहाना एक बेहतर विकल्प है जिससे पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है। हमें पानी को पैसे की तरह बचाना चाहिए ताकि भविष्य में इसकी किल्लत न हो। गंभीरता से सोचें और याद करें कि जब टोंटी खोलने पर पानी नहीं आता है तो उस वक्त हमें कैसा लगता है!

सुभाष चंद्र लखेड़ा, नई दिल्ली

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