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चौपालः नीयत और हकीकत

अकसर देखा जाता है कि चुनाव के समय तमाम सवर्ण नेता दलित वोट जुटाने के लिए दलितों के घर खाना खाने जाते हैं और जनता को दिखाने के लिए अपने दलित प्रेम का इजहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

Author May 5, 2018 4:16 AM
दलितों के सहारे भाजपा सत्ता में आने का दावा करती है, उनका उसे कोई खयाल नहीं है।

नीयत और हकीकत

अकसर देखा जाता है कि चुनाव के समय तमाम सवर्ण नेता दलित वोट जुटाने के लिए दलितों के घर खाना खाने जाते हैं और जनता को दिखाने के लिए अपने दलित प्रेम का इजहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन हकीकत है कि ऐसे दिखावटी प्रेम से आज तक किसी दलित का भला न हुआ है न होगा। बीते दिनों भाजपा नेता सुरेश राणा भी ऐसे ही एक भोज में गए थे जिसके बाद आरोप लगा कि वह खाना हलवाई ने बनाया था और बर्तन बाहर से मंगाए गए थे। भला इस तरह के प्रेम से दलितों का क्या कल्याण होगा? इससे पहले प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष, गृहमंत्री और तमाम विपक्षी नेता भी दलितों के घर भोज कर चुके हैं। गौरतलब है कि नेताओं के भोज के बाद न तो उस दलित परिवार के आर्थिक जीवन में कोई बदलाव देखने को मिलता है न ही सामाजिक जीवन में।

आखिर हमारे नेताओं को कब समझ आएगा कि इस तरह की हमदर्दी से न तो दलितों पर अत्याचार कम हो रहे हैं और न उनके प्रति जाति आधारित भेदभाव कम हो रहा है। इसके विपरीत सुरेश राणा जैसे नेताओं की वजह से वे अपमानित ही महसूस करते हैं।
सौरभ बघेल, मथुरा

इनका इलाज

दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान अर्थात एम्स में लालू यादव और उनके समर्थकों ने जो हंगामा किया, उसे किसी भी हालत में शोभनीय नहीं माना जा सकता। इलाज पूरा हो गया, डॉक्टरों की टीम ने उन्हें कह दिया था कि अब वापस बिहार जा सकते हैं और वहां के अस्पताल में इलाज करा सकते हैं। एम्स में लगभग एक महीने से उनका इलाज चल रहा था। एक अनुशासन-प्रिय नागरिक होने के नाते लालू यादव को चले जाना चाहिए था। जानबूझ कर हंगामा कर खबरों में रहना हमारे नेताओं, खास तौर पर अपराधी नेताओं की पुरानी आदत है। सत्ता-सुख छिन जाने के बाद व्यक्ति अथवा नेता कैसे बिफर जाते हैं और उलटी-सीधी हरकतें करते हैं, इसकी आज की तारीख में खूब मिसालें मिलेंगी। परिवारवाद के दूसरे नंबर के सबसे बड़े लाभार्थी बन कर लालूजी अब अपनी लच्छेदार भाषा से जनता को और ज्यादा बेवकूफ नहीं बना सकते। जनता सब समझती है।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर 

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