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चौपाल: अपनी मिट्टी, देशभक्ति का तमाशा

हर शख्स के दिल में अपने देश के लिए सम्मान होता है मगर सोशल मीडिया के दौर में कहीं न कहीं यह देशप्रेम दिखावे का रूप लेता जा रहा है।

nationalism, bharat mata ko jai, BJP, Congress, RSSभारतीय तिरंगा (पीटीआई फोटो, चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है)

अपनी मिट््टी

वर्षों से एक कहावत हमारे देश में प्रचलित रही है कि ‘अपनी मिट््टी से जुड़े रहना चाहिए’। यह कहावत लगभग हर परिप्रेक्ष्य में सटीक बैठती है चाहे बात देशभक्ति की हो, अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की हो या फिर बर्तनों की ही क्यों न हो। आज इक्कीसवीं सदी में सचमुच हम अपनी मिट््टी से दूर होते जा रहे हैं, खासकर अपने खाने के बर्तनों के मामले में। हमारे देश में हजारों साल से मिट््टी के बर्तनों का उपयोग होता आया है। आज भी हमारे घरों में बहुत सारे पर्व-त्योहार ऐसे होते हैं जब हम मिट््टी के बर्तनों का ही प्रयोग करना शुभ मानते हैं। दक्षिण के बहुत से मंदिरों में आज भी मिट््टी के बर्तनों में बना भोजन ही पवित्र माना जाता है।

इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी मान चुका है कि मिट््टी के बर्तनों में खाना खाने के अनेकफायदे हैं। मिट््टी के बर्तनों का लाभ यह है कि इनमें भोजन सही तरह से पकता है और उसके सूक्ष्म पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते, जिससे भोजन करने पर हमें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं। हमारे शरीर को प्रतिदिन अठारह प्रकार के पोषक तत्त्वों की जरूरत होती है जैसे कैल्शियम, मैगनीशियम, सल्फर, आयरन आदि और ये सारे पोषक तत्त्व मिट््टी में पाए जाते हैं।

इसके अलावा अगर हम मिट््टी के बर्तनों का प्रयोग करते हैं तो इसका पैसा हमारे देश के गरीब लोगों तक पहुंचता है। आज मिट््टी से बर्तन बनाने की हमारी स्वदेशी तकनीक सीमित होती जा रही है। देश में मिट्टी से वस्तुएं बनाने वाले कारीगर दिनों-दिन कम हो रहे हैं क्योंकि इस व्यवसाय में उन्हें अब वह लाभ नहीं हो पा रहा जो कभी होता था। आज हमारे घरों से हर प्रकार के मिट््टी के बर्तन गायब हो चुके हैं। गर्मियों में अब लोग मिट््टी के मटकों के बजाय फ्रिज का पानी पीना ज्यादा पसंद करते हैं। आज हम एल्यूमीनियम और स्टील बर्तनों का प्रयोग सबसे अधिक करते हैं। लेकिन अगर हम इनके स्थान पर आधी मात्रा में भी मिट््टी के बर्तनों का प्रयोग करें तो वह हमारी और हमारे देश की सेहत दोनों के लिए बेहतर होगा।
’विवेकानंद विमल ‘विमर्या’, देवघर, झारखंड
देशभक्ति का तमाशा

हर शख्स के दिल में अपने देश के लिए सम्मान होता है मगर सोशल मीडिया के दौर में कहीं न कहीं यह देशप्रेम दिखावे का रूप लेता जा रहा है। आज सरहद पर अगर जवान शहीद हो जाते हैं तो सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी तकरीरें डाल दी जाती हैं, जो दिखाती हैं कि हम कितने बड़े देशभक्त हैं! 15 अगस्त और 26 जनवरी को अपनी फेसबुक-दीवार पर तिरंगे की फोटो चिपका दी जाती है और दिखा दिया जाता है देशप्रेम! इनमें से बहुत-से लोग ऐसे होते हैं जो फेसबुक की दुनिया से बाहर आने के बाद बुजुर्गों, मां-बहनों या किसी की भी इज्जत नहीं करते मगर फेसबुक पर देशप्रेम जरूर दिखा देते हैं।

ेइस नए दौर में देशप्रेम सोशल मीडिया पर लिखी गई बड़ी-बड़ी तकरीरों से मापा जाता है। अगर आप सोशल मीडिया पर लेख नहीं लिखते हैं तो उन लोगों में शुमार कर दिए जाएंगे जिन्हें अपने देश की कोई चिंता नहीं। समझ नहीं आता कि क्या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले लोग ही देशभक्त हैं बाकी लोग देशद्रोही! यह कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया के इस दौर में देशभक्ति भी तमाशा बनती जा रही है।
’सुकांत तिवारी, नई दिल्ली

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