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बिखरते परिवार

दूसरी तरफ महानगरीय जीवन की स्थिति बड़ी ही दयनीय है। पहले पढ़ाई फिर कॅरियर और आजीविका में उलझ कर रह गए हैं। जो समय बचता है वह तकनीक पूरा कर देता है।
Author June 20, 2017 06:01 am
सोशल मीडिया।

बिखरते परिवार
आधुनिक होती जा रही दुनिया की रेतघड़ी से वक्त कितनी तेजी से फिसलता जा रहा है। कमोबेश युवा और नई पीढ़ियां कैसे तकनीकी सलाखों से दूरियों वाली खाई खोदते जा रहे हैं। बेशक तकनीक के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता, पर गौर फरमाने वाली बात यह है कि तकनीक हमें हरी-भरी डाल से कब काट का अलग कर देती है, पता ही नहीं चलता है। संयुक्त परिवार की बानगी के बिखरने की एक मुख्य वजह यह भी है। कहा जाता है कि मां और ममता एक दूसरे के पूरक हैं। मां परिवार का वट वृक्ष होती है। घर-परिवार पर कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आई हो। उस समय भी मां के अंदर उतना जीवट दिखता है, जितना आम दिनों में। खुशी के पल हो तो बस उसका आंचल सिर पर पड़ जाए, मालूम पड़ता है कि सदियों का सुखद एहसास मिल गया।
लेकिन यह ममता और जीवट की परंपरा दिनोंदिन खोखली होती जा रही है। मां की ममता में रत्ती भर बदलाव नहीं है, लेकिन हमारी पीढ़ियां बदल रही हैं। गांवों में स्थिति कुछ हद तक ठीक है। दूसरी तरफ महानगरीय जीवन की स्थिति बड़ी ही दयनीय है। पहले पढ़ाई फिर कॅरियर और आजीविका में उलझ कर रह गए हैं। जो समय बचता है वह तकनीक पूरा कर देता है। बेशक, ये पीढ़ियां अपना पैर तो जमा लेती हैं, जो जरूरी भी है। लेकिन इस बीच परिवार और बुजुर्ग ऐसे छूट जाते हैं जैसे गांव का पुराना मकान। यही संवेदनहीनता आगे चल कर असाध्य रोग में तब्दील हो जाती है।
बहरहाल, वक्त के साथ ये पीढ़ियां अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान दे रही हैं? संघर्षों के समर से कुछ पल चुरा कर परिवार की नींव को भी सींचना होगा, ताकि उनकी खुशियों को बांटने वाला मन और दुख की घड़ी में सिर पर हाथ फेरने वाला मिल सके। इससे निबटने का उपाय यह है कि सामाजिकता को अपने व्यवहार में लाना होगा। कॅरियर की सफलता और संवेदनशीलता मिल कर एक बेहतर संसार रचने का सफल प्रयास नए सिरे से किया जा सकता है।

’पवन मौर्य, वाराणसी
जले पर नमक
फलां-फलां नेताओं ने दलितों के साथ बैठ कर खाना खाया! क्या हमें यह नहीं लगता कि ऐसे वाक्य दलितों का अपमान करते हैं? यह काम तो आम भारतीय, चाहे वह किसी भी जाति का हो, वर्षों से करता आ रहा है। वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और दूसरे स्थानों में काम करने वाले संगी-साथी एक प्लेट में खाते चले आ रहे हैं, भले ही उनमें कोई किसी भी जाति का हो। दरअसल, ऐसी खबरों को देख-सुन कर लगता है जैसे इससे पहले कभी किसी भी सवर्ण नेता ने दलित पृष्ठभूमि से आने वाले बड़े और कद्दावर नेताओं, मुख्यमंत्रियों, सांसदों, मंत्रियों या विद्वानों के साथ भोजन नहीं किया। अगर ऐसा है तो यह एक ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय है। कई दशकों से देश के करोड़ों लोग भोजन खाते वक्त किसी होटल, ढाबे या कैंटीन में कभी यह नहीं पूछते कि भोजन पकाने वाला किस जाति का है। ऐसे में अगर राजनीति ही करनी है तो कोई दूसरा तरीका ढूंढ़ना चाहिए। वोट लेने के लिए ऐसा नाटक चालाक मनोवृत्ति का परिचायक है। यह तो जख्म कुरेदने वाला तरीका है।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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