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चौपाल : इम्तिहान और भी

पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं तो वह इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। इसीलिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने में लगा है।

Author नई दिल्ली | August 9, 2019 2:44 AM
पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं तो वह इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। इसीलिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने में लगा है।

कश्मीर में ‘कुछ बड़ा होने वाला है’ के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा। लेकिन यह समझ से परे है कि गुलाम नबी आजाद, महबूबा मुफ्ती, उमर या फारूक अब्दुल्ला सरीखे नेता जो कल तक कहते थे कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक है, वे केंद्र सरकार के इस राजनीतिक हल को क्यों नहीं पचा पा रहे हैं? शायद इसलिए कि केंद्र के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था? घरेलू मोर्चे पर भले ही केंद्र सरकार ने इसके संवैधानिक, कानूनी, राजनीतिक, आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी है।

पाक की घरेलू राजनीति, उसके चुनाव सब कश्मीर के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं तो वह इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा। इसीलिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करने में लगा है। जो लोग इस समय घाटी में सुरक्षा के लिहाज से केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों जैसे अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती, धारा 144 या नेताओं की नजरबंदी को लोकतंत्र की हत्या या तानाशाही रवैया कह रहे हैं उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि पाक की कोशिश होगी कि किसी भी तरह घाटी में कश्मीरियों के विद्रोह के नाम पर हिंसा की आग सुलगाई जाए ताकि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संदेश दे पाए कि भारत कश्मीरी अवाम की आवाज को दबा कर वहां अन्याय कर रहा है। इस बहाने वह संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं को दखल देने के लिए बाध्य करने की फिराक में है। इसलिए भारत के कुछ दल केंद्र सरकार के इन कदमों का विरोध करके न सिर्फ पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं बल्कि एक आम कश्मीरी के साथ भी अन्याय कर रहे हैं।

विगत 70 सालों ने साबित किया है कि धारा 370 वह लौ थी जो कश्मीर के गिने चुने राजनीतिक रसूख वाले परिवारों के घरों के चिरागों को तो रोशन कर रही थी लेकिन आम कश्मीरी के घरों को आतंकवाद अशिक्षा और गरीबी की आग से जला रही थी। जब 21वीं सदी के भारत के युवा स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया के जरिए उद्यमी बनकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भविष्य के भारत की सफलता के किरदार बनने के लिए तैयार हो रहे थे तो कश्मीर के युवा 500 रुपए के लिए पत्थरबाज बन कर भविष्य के आतंकवादी बनकर तैयार हो रहे थे। क्या हम एक आम कश्मीरी की तकलीफ का अंदाजा गृहमंत्री के राज्यसभा में दिए इस बयान से लगा सकते हैं कि वह एक सीमेंट की बोरी की कीमत देश के किसी अन्य भाग के नागरिक से 100 रुपए ज्यादा चुकाता है सिर्फ इसलिए कि वहां केवल कुछ लोगों का रसूख चलता है?

अब सरकार के इस कदम से राज्य में निवेश होगा, उद्योग लगेंगे, पर्यटन बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे जिनसे खुशहाली आएगी। इसके अलावा अपने अलग संविधान और अलग झंडे के अस्तित्व के कारण जो कश्मीरी अवाम आजतक भारत से अपना भावनात्मक लगाव नहीं बना पाया अब भारत के संविधान और तिरंगे को अपना कर उसमें निश्चित रूप से एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का आएगा जो धीरे-धीरे उसे भारत के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ेगा। जरूरत है आम कश्मीरी के मन में इस फैसले के पार एक नई खुशहाल सुबह के होने का विश्वास जगाने की, उसका विश्वास जीतने की। कूटनीतिक और राजनीतिक लड़ाई तो केंद्र सरकार जीत चुकी है लेकिन उसकी असली चुनौती कश्मीर में सालों से चल रहे इस रणनीतिक युद्ध को जीतने की है।

नीलम महेंद्र, फाल्का बाजार, लश्कर, ग्वालियर 

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