chaupal about condition of mothers in our society - चौपालः मां का दर्जा - Jansatta
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चौपालः मां का दर्जा

पैसे कमाने के चक्कर में लोग अपने मां-बाप की लंबे समय तक खबर लेना भूल जाते हैं।

Author May 28, 2018 5:34 AM
Jharna Biswas at Old age home, Gharaunda, in Asola, Mehrauli, New Delhi, on Saturday, May 13, 2017. Express photo by Abhinav Saha

मई के दूसरे रविवार को हर साल मातृ दिवस के रूप में मनाया जाता है। हमारे देश में भी लोगों ने यह अपने-अपने तरीके से मनाया। प्रत्यक्ष व वास्तविक रूप में लोगों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया, यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने खूब जताना चाहा कि वे अपनी मां से कितना प्यार करते हैं! लोगों ने इस दिन पर भावुक टिप्पणियां डालीं, अपने ‘स्टेटस’ व ‘डीपी’ भी बदल लिए। लेकिन क्या इस आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में मां का दर्जा हमने बरकरार रखा है? आज इंटरनेट वाली गति से दौड़ती-भागती जिंदगी में हमने अपने परिवार को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

पैसे कमाने के चक्कर में लोग अपने मां-बाप की लंबे समय तक खबर लेना भूल जाते हैं। कई बार तो देखा जाता है कि मां-बाप बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा करते हैं, उन्हें सम्मानपूर्वक जिंदगी जीने लायक बना देते हैं लेकिन बाद में पता चला कि बच्चा शहर गया और मां-बाप को ही भूल गया। इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण तो कपड़ा बनाने वाली मशहूर कंपनी रेमंड के मालिक का है। जो विजयपत सिंघानिया एक जमाने में अपने करोड़ों के घर में रहते थे वही किराए के घर में जिंदगी गुजारने को मजबूर हो गए।

इससे भी वीभत्स वाकया गुजरात के राजकोट का था जहां एक प्रोफेसर नें अपनी मां की बीमारी से परेशान होकर छत से गिरा कर उसकी हत्या कर दी। इस तरह के न जाने कितने मामले रोज सामने आते हैं जहां मानवीय मूल्यों व नैतिकता को निम्नतम स्तर तक पहुंचा दिया जाता है। लिहाजा, हमें जरूरत है वास्तविकता में जीने की और अपने मां-बाप को सम्मान देने की। लेकिन इस नैतिकता को याद दिलाने के लिए अदालतों व सरकारों को भी दखल देना पड़ता है। खबर आई है कि माता-पिता का त्याग करने पर छह माह तक की जेल हो सकती है।

शिवेंद्र तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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