ताज़ा खबर
 

चौपालः भ्रष्टाचार के विरुद्ध

आजकल पूरे देश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अखबारों, पत्रिकाओं और अन्य माध्यमों में संदेश प्रकाशित-प्रसारित किए जा रहे हैं।

Author May 14, 2018 4:13 AM
प्रतीकात्मक चित्र

भ्रष्टाचार के विरुद्ध

आजकल पूरे देश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अखबारों, पत्रिकाओं और अन्य माध्यमों में संदेश प्रकाशित-प्रसारित किए जा रहे हैं। जिलाधिकारियों और मुख्यमंत्रियों के व्यक्तिगत टेलिफोन नंबर सोशल मीडिया पर यह कह कर दिए जा रहे हैं कि राज्य या केंद्र सरकार का कोई कर्मचारी या अधिकारी रिश्वत मांगे तो इस नंबर पर सीधे शिकायत करें; उस पर तुरंत कार्रवाई होगी। यहां गौरतलब है कि भारत के लगभग हर जिले की कचहरी में शादी, आय, अनुसूचित जाति या पिछड़ी जाति आदि के तमाम प्रमाण पत्र बनवाए और संपत्ति का बैनामा व रजिस्ट्री आदि कराए जाते हैं। इन कामों के लिए सरकार की तरफ से एक शुल्क निर्धारित है, पर अत्यंत दुखद और खेदजनक है कि उस घोषित शुल्क पर वहां कुछ भी नहीं होता।

वहां कचहरी में नीचे से ऊपर तक कर्मचारियों, वकीलों, अधिकारियों आदि का एक बहुत ही संगठित व ताकतवरवर्ग है जो सरकार द्वारा घोषित शुल्क से कई-कई गुना अधिक रकम गरीब जनता से खसोट रहा है। वहां न कोई सुनने वाला है, न देखने वाला। इस स्थिति में सोशल साइट पर दिया गया जिलाधिकारियों और मुख्यमंत्री का टेलिफोन नंबर डायल करने पर बार-बार ‘अभी पहुंच से बाहर है’ सुनाई देता है और फिर फोन कट जाता है।

इस देश में प्रधानमंत्री तक बार-बार सार्वजनिक मंचों से यह घोषणा करते नहीं थकते कि हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे। आखिर उनका यह मिशन कब इस पतित-पावन धरती पर अमल में लाया जाएगा? कहीं भी जाइए, वास्तविकता यही है कि बगैर रिश्वत के आपका काम नहीं होगा। अगर आप इस संगठित वर्ग के खिलाफ एक शब्द भी बोल देंगे तो उसके लोग इकट्ठे होकर मारपीट-गालीगलौज करने से जरा भी संकोच नहीं करते।

देश में सर्वत्र फैले ये भ्रष्टाचार और रिश्वत के गढ़ बने राज्य सरकार के संस्थान ठीक जिला जजों और जिला कलेक्टरों की नाक के नीचे कार्यरत हैं। क्या ये संस्थान हमारे प्रधानमंत्री के महत्त्वाकांक्षी मिशन ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ से बाहर हैं? इन पर नकेल क्यों नहीं कसी जाती है? क्या राज्य सरकार के इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों को सरकार की तरफ से वेतन नहीं मिलता? आखिर ये संस्थान स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार और रिश्वत के अड्डे क्यों बने हुए हैं?

हमारे भारत महान में क्या कभी वह स्थिति आएगी कि आप अपना जीवन शांतिपूर्ण ढंग से, बगैर धोखाधड़ी, बगैर रिश्वत, बगैर भ्रष्टाचार के जी सकें! मौजूदा हालात को देखते हुए तो नहीं लगता कि अगले एक हजार सालों में भी इन तमाम बुराइयों से यह देश मुक्त हो पाएगा?

निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

कैसे नाम

दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन (डीएमआरसी) विभिन्न स्टेशनों के नाम कठिन और लंबे बना रही है। विश्वविद्यालय स्टेशन का नाम ‘हौंडा 2 व्हीलर विश्वविद्यालय’ कर दिया है। सिकंदरपुर का नाम ‘बैंक ऑफ बड़ौदा सिकंदरपुर’ कर दिया है। यह अनुचित है। किसी स्टेशन के नाम के आगे किसी कंपनी या किसी सार्वजनिक उपक्रम का नाम जोड़ना अनुचित है। मेट्रो रेल कार्पोरेशन को अगर किसी स्टेशन पर किसी का प्रचार करना है तो वह पूरे स्टेशन पर जहां चाहे प्रचार कर सकती है लेकिन स्टेशन के नाम के आगे बैंक ऑफ बड़ौदा आदि जोड़ना व हरेक को लंबा नाम बोलने पर मजबूर करना अनुचित है। डीएमआरसी को सभी स्टेशनों से सभी व्यापारिक शब्द फौरन हटाने चाहिए। लालकिले की देखभाल अब डालमिया के जिम्मे है, पर स्थल का नाम डालमिया लाल किला नहीं है!

’जीवन मित्तल, मोती नगर, नई दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App