बदलते समीकरण

भारत-प्रशांत यानी इंडो-पेसिफिक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक महत्त्व यूरोप में भी अपनी पांव फैला रहा है, जिसके फलस्वरूप यूरोपीय संघ अपनी उपस्थिति को बढ़ाना चाहता है।

सांकेतिक फोटो।

भारत-प्रशांत यानी इंडो-पेसिफिक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक महत्त्व यूरोप में भी अपनी पांव फैला रहा है, जिसके फलस्वरूप यूरोपीय संघ अपनी उपस्थिति को बढ़ाना चाहता है। बीते हफ्ते 16 सितंबर को यूरोपीय संघ ने यूरोप की उपस्थिति को भारत-प्रशांत क्षेत्र में सशक्त करने के लिए एक औपचारिक रणनीति की घोषणा की। इसे अगले सप्ताह वाशिंगटन में पहली क्वाड बैठक से पहले क्षेत्र के लिए एक बड़ी गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें इंडो-पेसिफिक के प्रमुख खिलाड़ी यानी भारत, जापान, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका भाग ले रहे हैं।

दरअसल, यूरोपीय संघ भारत-प्रशांत क्षेत्र के साथ अपने रणनीतिक जुड़ाव को आगे बढ़ा रहा है। इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्त्व यूरोप के लिए बहुत ज्यादा है और इसका बढ़ता आर्थिक, जनसंख्या और राजनीतिक वजन इसे नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाता है और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में भी। यूरोपीय संघ का मकसद लोकतंत्र, कानून के शासन, मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप क्षेत्र की स्थिरता, सुरक्षा, समृद्धि और सतत विकास में योगदान करना है। यूरोपीय संघ की रणनीति में जापान और भारत के साथ संपर्क, साझेदारी के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाना भी शामिल है। भागीदारी और सहयोग समझौते को पूरा करना, हरित गठबंधन, महासागरीय व्यवस्था के संचालन और स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए समर्थन को मजबूत करना और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सबसे कम विकसित देशों में महामारी का सामना करने की तैयारी भी यूरोपीय संघ की रणनीति का हिस्सा है।

यूरोप की दिलचस्पी में बढ़ोतरी का एक और मुख्य कारण है चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां और क्षेत्र पर बनता दबदबा, जो यूरोप को अब खलने लगा है। यूरोपीय संघ ने लक्ष्य के रूप में तय किया है कि वह अपना प्रभाव एशिया में बढ़ाएगा, खासकर अफगानिस्तान में हालात के मद्देनजर। चूंकि यूरोपीय संघ ताइवान को चीन का हिस्सा नहीं मानता और अपनी गतिविधियों को बढ़ाने जा रहा है तो इस बात से नाराज चीन के एक राजनयिक ने यूरोपीय संघ को चीनी व्यवसाय के खिलाफ ‘भेदभावपूर्ण’ कार्यों के लिए चेतावनी जारी कर दी।

चीन ‘वन चाइना’ नीति के तहत लोकतांत्रिक, स्व-शासित ताइवान भाग को अपनी मुख्य भूमि के साथ एकजुट करने की मंशा रखता है और नियमित रूप से किसी भी वैसी चाल से नाराज होता है जो ताइवान को अलग देश मानने की बात करता है। ऐसी स्थिति में यह देखने के बात होगी कि देशों के बीच बनते नए समीकरण और नई व्यवस्था में आम लोगों की क्या जगह रहती है!
’आयुष आनंद, पटना, बिहार

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