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खानपान का लोकतंत्र

कभी-कभी लगता है कि मांस खाने या न खाने से ज्यादा आपके चारों ओर का माहौल आपके अंदर की दया-करुणा को ज्यादा कंडीशन करता है।

Author नई दिल्ली | April 4, 2016 01:50 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हम इंसानों का भोजन सामिष होना चहिए या फिर निरामिष- इस पर बहस की जा सकती है। इस विवाद में पक्ष और विपक्ष से तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन स्थितियां तब उलझ जाती हैं जब कोई पक्ष भोजन की आदतों के आधार पर खुद को दूसरों से श्रेष्ठ ठहराने लगता है; छोटा-बड़ा, दयावान-निर्दयी, अच्छा या गंदा बताने लगता है। अपवाद हो सकते हैं, पर हर मांसाहारी निर्दयी हो, यह जरूरी तो नहीं है। वैसे ही जैसे कि शाकाहारी भर हो जाना दयावान या फिर ज्यादा करुणामय हो जाने की गारंटी नहीं हो सकता।

यूरोप, खासकर इंग्लैंड में, जहां मुझे कुछ समय रहने का मौका मिला था, मेरा अनुभव रहा है कि ज्यादातर लोगों के अंदर, कम से कम आज के जमाने में प्राणिमात्र के लिए, फिर वह चाहे जंगली परिंदा हो या पालतू कुत्ता-बिल्ली- करुणा की भावना बहुत अधिक होती है। वहां के नामचीन शिकारी भी, चाहे वह कॉर्बेट हों या एंडरसन, अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत दयावान रहे हैं। जबकि वहां मांसाहार एक सामान्य-सी चीज है। हमारे देश में जहां दया-करुणा की बातें आम हैं, सड़क के किनारे बैठे कुत्ते को लतियाना या बोझ से लदी गाड़ी को खींचने वाले झाग उगलते भैंसे को लगातार पिटते हुए देखना तो दीगर, ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जिन्हें नव-विवाहिता को जलाने या नवजात बेटी को मार डालने में भी ज्यादा तकलीफ नहीं होती।

कभी-कभी लगता है कि मांस खाने या न खाने से ज्यादा आपके चारों ओर का माहौल आपके अंदर की दया-करुणा को ज्यादा कंडीशन करता है। पश्चिम में जानवरों को मारने के तरीकों के पीछे यह सोच जरूर दिखाई देती है कि उन्हें तकलीफ कम से कम हो। ‘स्लॉटर’ की प्रक्रिया भी वहां नुमाइश नहीं बनती। इन चीजों का हमारे देश में कभी संज्ञान लिया जाता हो- कम से कम मुझे तो नहीं पता।

इस पृष्ठभूमि में गोवध को लेकर मचा बवाल बेतुका और छिछली भावुकता को भुनाने का एक प्रायोजित षड्यंत्र-सा लगता है। किसी की भोजन की आदतों को अच्छा या बुरा कहने का अधिकार किसने दिया है हमें? किसी जानवर को ‘स्लॉटर’ करने के तरीकों पर कोई बौद्धिक बहस हो तो बात फिर भी समझ में आती है। समाज का एक वर्ग अगर गाय को पूजनीय मानता है तो अच्छी बात है। पर किसी को इसके लिया बाध्य करना कि वह भी ऐसा ही करे, कुछ अजीब लगता है। जोर-जबर्दस्ती, मार-पीट, दंगा-फसाद की शुरुआत इसी तरह की बेतुकी कोशिशों से होती है। फिर सोशल मीडिया में बाढ़ आ जाती है निहायत ही भद्दी, डराने वाली और अशोभन टिप्पणियों की।

अपनी बात कहिए जरूर, पर उसे जबर्दस्ती थोपिए नहीं। दूसरे को भी उसकी जगह सम्मान के साथ दीजिये। क्या हासिल होगा अगर हम खुद अपने समाज को बहुत से खांचों में बांट देंगे, ऐसे खांचे जिनके आर-पार देखना भी नामुमकिन हो जाए। (राजशेखर पंत, भीमताल, नैनीताल)
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किसान की व्यथा
देश में किसानों की फसलें नष्ट हो रही हैं, लेकिन प्रशासन भी जमीन कब्जा करने गुंडागर्दी पर उतर जाए तो क्या कहा जाए! देश भर में अनगिनत किसानों को प्रशासन आंख दिखा कर मासूम जनमानस को डराने का काम करते रहे हैं। यह सवाल है उन बेबस किसानों का, जो शिक्षा के अभाव में पढ़ाकू अफसर की चेतावनी से डर जाते हैं। लेकिन सच यह है कि सरकार और प्रशासन की मिलीभगत का नतीजा होता है कि सही वक्त पर किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाता। आलम यह है कि देश के विभिन्न शहरों के किसानों और आला अफसरों के बीच बहस होती रहती है। इसमें दोनों की अपनी मजबूरी है, किसानों को घर में दो वक्त की रोटी देना है और अफसर को कुर्सी की रक्षा। ऐसे तमाम मामले हैं, जिनमें फसलें चौपट होने, कर्ज न चुका पाने की वजह से आत्महत्या, जमीन की भयानक लूट जैसी किसानों की त्रासदी खुल कर सामने आई है। लेकिन सच यह है कि सरकार और धनपतियों से लेकर प्रशासन तक को किसानों की कोई फिक्र नहीं है। ऐसे मामलों में अफसरों को सहयोग होना चाहिए, क्योंकि ग्रामीणों में शिक्षा का अभाव है। लेकिन हकीकत छिपी नहीं है। भूमाफिया तो खैर अपनी प्रकृति के हिसाब से काम करते हैं, प्रशासन भी उनकी ही सहयोगी की भूमिका में आ जाता है। क्या सरकार के इसी रुख से किसान का दुख खत्म होगा? (शुभम द्विवेदी, भोपाल)
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मौत का पुल
कोलकाता में निर्माणाधीन फ्लाइओवर गिर गया, जिसके चलते कई लोगों की जान गई और कई जख्मी हुए। जिन्हें सबसे ज्यादा दुख और गुस्सा होना था, वे अपनी राजनीति को भुनाने का मौका देख रहे हैं। भाजपा को देख कर ऐसा लग रहा है, मानो उसे तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चे की सरकार को एक साथ घेरने का मौका मिल गया हो। जिस फ्लाइओवर का काम दो साल में हो जाना चाहिए था, वह तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के पांच साल के दौरान भी पूरा नहीं हुआ। किसने और किसके इशारे पर काम इतना लंबा खिंचा? किसने संबंधित कंपनी के काम की निगरानी की? क्या इसके लिए केवल पूर्व सरकार जिम्मेदार है? राज्य में फ्लाइओवर का गिरना कोई बहुत अलग घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं देश के अलग-अलग राज्यों में घटती रही हैं। कई लोग इन घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं और फिर लीपापोती के लिए प्रशासन की ओर से ऐसी जांच की जाती है, जिसमें क्या होता है पता नहीं चलता। शायद यह भी एक कारण है कि फ्लाइओवर का निर्माण करने वाली कई कंपनियों के अफसर ढुलमुल रवैया रखते हैं। (मीना बिष्ट, पालम, नई दिल्ली)
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कैसा समाज
कहां जा रहा है भारतीय समाज? बांग्लादेश से जीत के जश्न में आठ वर्षीय पुत्र के साथ घर की बालकनी में क्रिकेट खेल रहे डॉक्टर पंकज नारंग से प्लास्टिक की बाल एक स्कूटी सवार को छू जाने पर उसने कई लोगों के साथ मिल कर पंकज नारंग को मारा और आखिर हत्या कर दी। हत्या से कम दुखद यह नहीं है कि डॉक्टर की पिटाई होते देख आसपास के लोगों ने अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिए। दिल्ली के लोग गुंडों से जितना डरते हैं, उससे कहीं अधिक पुलिसिया कार्रवाई और व्यवहार से। शायद इसीलिए ऐसी स्थिति में भी किसी को बचाने या मदद कर पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। लेकिन आखिरकार यह एक शर्मनाक पहलू है। (आमोद शास्त्री, दिल्ली)

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