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चौपालः लोकाचार की बात

नवजोत सिद्धू के व्यवहार को लेकर दो आपत्तियां जताई गई हैं- पाक सेना प्रमुख बाजवा से गले मिलना (गाली देना नहीं), और पीओके प्रमुख मसूद खान के बगल वाली सीट पर बैठना।

Author August 23, 2018 5:36 AM
नवजोत सिंह सिद्धू और अमरिंदर सिंह

लोकाचार की बात

बीस अगस्त के अंक में मुखपृष्ठ पर छपा मुख्य समाचार कैप्टन अमरिंदर सिंह की टिप्पणी का था जो उन्होंने नवजोत सिद्धू के पाकिस्तान में सेना प्रमुख से गले मिलने पर की। इस मुद्दे पर कैप्टन साहब ने अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। आदत के मुताबिक जल्दी-जल्दी पृष्ठ छह पर आने के लिए पन्ने पलटे तो संपादकीय टिप्पणी के ‘गलबहियां और गुगली’ शीर्षक की व्यंग्यात्मक ध्वनि से ही साफ हो गया कि अब यहां भी सिद्धू घिरने वाले हैं! दुख तो पहले से कैप्टन साहब की बात पर ही हो रहा था, संपादकीय पढ़ते हुए कुछ हैरानी और परेशानी-सी भी होने लगी।

नवजोत सिद्धू के व्यवहार को लेकर दो आपत्तियां जताई गई हैं- पाक सेना प्रमुख बाजवा से गले मिलना (गाली देना नहीं), और पीओके प्रमुख मसूद खान के बगल वाली सीट पर बैठना। इन दोनों आपत्तियों के जवाब में नवजोत सिद्धू ने जो कहा है, वह राजनीति की नजर से बहुतों को परेशान भले ही करता हो, लेकिन दोनों मुल्कों के आपसी संबंधों को मधुर बनाने और आतिथ्य की संस्कृति को ध्यान में रखते हुए इसमें कहीं कुछ गलत नहीं लगता। पाक-सेना प्रमुख से गले मिलने पर उठाई गई आपत्ति पर सिद्धू का कहना है कि अगर कोई पास आकर सांस्कृतिक एकता की बात करे और बाबा नानक की 550वीं जयंती पर गुरद्वारा करतारपुर साहब का मार्ग खोलने की बात कहे, तो वे उपेक्षापूर्ण रवैया कैसे दिखा सकते थे! पीओके प्रमुख के बगल में बैठने वाली बात पर भी सिद्धू का तर्क वाजिब है कि अतिथि को बिठाने की व्यवस्था मेजबान की होती है। यह बड़ी सीधी-सी, लोकाचार की बात है। राजनीति की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं में उलझा कर इसे जटिल बनाने की कोशिश की जा रही है।

यह कहना भी उचित नहीं लगा कि नवजोत सिद्धू वहां जाकर कूटनीतिक मसले सुलझाने लगे। नवजोत सिद्धू देश के एक राज्यमंत्री होने के साथ-साथ सम्मानित नागरिक भी हैं। क्रिकेट में भारत का मान बढ़ाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी, जिनके नाम से पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा परिचित है। स्वाभाविक है कि वहां मौजूद लोग उनसे कुछ शब्द कहने की अपेक्षा रखेंगे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के शपथग्रहण समारोह में उनका जाना दो अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के बीच दोस्ती और एक सहज सांझेपन का तकाजा था। मोदीजी के बिन बताए पाकिस्तान में उतर कर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से गलबहियां डालने से बिल्कुल अलग। नवजोत सिद्धू के खिलाफ भाजपा द्वारा कड़े तेवर अपनाने की बात तो फिर भी समझ में आती है। सिद्धू अगर बाजवा से गले न भी मिले होते, मसूद खान की बगल में न भी बैठे होते, तो भी भाजपा के लिए उनका पाकिस्तान जाना ही विवाद खड़ा करने का बहाना हो सकता था। लेकिन दुख तो पंजाब के मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर होता है। कम से कम कैप्टन साहब से इस तंग नजरिए की उम्मीद नहीं थी।

शोभना विज, पटियाला

त्वरित सजा

हमारे देश में दुष्कर्मियों को फांसी की सजा तो सुनाई जा रही है लेकिन फंदे को अभी भी इन अपराधियों को लटकाए जाने का इंतजार है। देश की अमन पसंद जनता चाहती है कि दुष्कर्मियों को फांसी के फंदे पर जल्दी लटकाया जाए। मंदसौर की फास्टट्रैक अदालत के फैसले से पहले भी कई ऐसे मामलों में दुष्कर्मियों को फांसी की सजा सुनाई गई है लेकिन अभी तक वे फंदे के करीब नहीं पहुंचे हैं। सजा सुनाए जाने के बाद की जो न्यायिक प्रक्रिया है, उसमें भी तेजी लाते हुए बलात्कारियों को जल्द से जल्द फांसी पर लटकाया जाना चाहिए। यही त्वरित न्याय का तकाजा है, ताकि अन्य दुष्कर्मियों में खौफ पैदा किया जा सके।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन

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