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बुलंदशहर घटना : किसकी जिम्मेदारी

अखिलेश यादव ने आला पुलिस अधिकारियों के निलंबन के जो कदम उठाए वे कड़े जरूर हैं, लेकिन वे अपनी सरकार पर राजनीतिक हमलों से बचने की कवायद ज्यादा लगते हैं

Author नई दिल्ली | August 8, 2016 4:48 AM
Bulandshahr gangrape, Bulandshahr gangrape case, Bulandshahr rape, Bulandshahr News, Bulandshahr latest newsघटना स्थल की एक तस्वीर। (Express Photo: Gajendra Yadav)

उनतीस जुलाई की रात बुलंदशहर में नेशनल हाइवे पर जो कुछ घटित हुआ उससे भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भयावह चिंता पैदा होती है। चलती कार में लोहे की चीज से हमला, फिर कार रुकने पर उसमें सवार एक परिवार, जो अपने परिजन की तेरहवीं की रस्म में शामिल होने शाहजहांपुर जा रहा था, के दो पुरुष सदस्यों को बंधक बना कर महिला सदस्यों- पैंतीस साल की मांऔर चौदह साल की उसकी बेटी- के साथ सामूहिक दुष्कर्म और लूटपाट! क्या उत्तर प्रदेश में सरकार है? क्या वहां पुलिस है? यदि हां, तो किसकी सुरक्षा के लिए? अगर राजधानी दिल्ली से केवल सत्तर किलोमीटर दूर हाइवे पर सफर कर रहे आम नागरिकोंको बेबस होकर इतनी बड़ी यातना सहनी पड़ी तो भारी-भरकम पुलिस बल और सरकारी मशीनरी का होना-न होना बराबर ही है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आला पुलिस अधिकारियों के निलंबन के जो कदम उठाए वे कड़े जरूर हैं, लेकिन वे अपनी सरकार पर राजनीतिक हमलों से बचने की कवायद ज्यादा लगते हैं, अन्यथा प्रदेश में कानून-व्यवस्था की ऐसी दुर्दशा क्यों होने दी? अपराधियों का बेखौफ होना और फलना-फूलना राजनीतिक व सामाजिक कारणों पर निर्भर करता है। अब वारदात में शामिल गिरोह सहित जिन अपराधी गिरोहों के नाम गिनाए जा रहे हैं क्या उनके बारे में पहले कुछ पता नहीं रहा होगा? तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या मुख्यमंत्रीजी या पुलिस महानिदेशकइसका जवाब देंगे? अखिलेशजी, मुलायमजी, क्या उत्तर प्रदेश का समाजवाद यही है? अन्य राजनीतिक दलों से ऐसी वारदातों पर जो प्रतिक्रिया आती है उसमें मानवीय संवेदना कम और विपक्षी दल को कोसने की भावना ज्यादा दिखती है। बसपा अपनी सुप्रीमो मायावती के खिलाफ एक टिप्पणी होने पर सड़कों पर उतर आती है, पुलिस के घोड़े की टांग टूटती है तो उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल आ जाता है, जेएनयू के ‘प्रगतिशील’ छात्र अफजल गुरु के समर्थन में आंदोलन कर सकते हैं, लेकिन बुलंदशहर की घटना न राजनीतिक गलियारों में, न लोगों के मन में भूचाल ला पाती है!

आखिर भारत के आम नागरिक की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी है, इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए। जब सरकारी तंत्र और पुलिस का मुख्य काम वीआइपी सुरक्षा हो, तब आम लोगों के लिए इन्हें फुरसत कैसे मिले? आम महिलाओं की सुरक्षा भगवान भरोसे है। एक सुव्यवस्थित राज्य और समाज में नागरिकों की सुरक्षा व्यक्ति की नहीं, राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए। लेकिन जब राज्य सुरक्षा न दे पाए तो नागरिक क्या करें? प्रधानमंत्रीजी ‘मन की बात’ में अक्सर देश के विकास के बारे में अपने विचार साझा करते रहे हैं। 15 अगस्त 2014 को लालकिले से संबोधन में उन्होंने देश की स्वच्छता और महिलाओं से संबंधित महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे, जो इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने संभवत: नहीं उठाए थे। विकास की पहली प्राथमिकता बुलेट रेलगाड़ी, स्मार्ट शहर या बड़े निर्माण कार्यों के बजाय भौतिक और मानसिक गंदगी साफ करना होना चाहिए। (कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)

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सुधरने का वक्त
केजरीवाल सरकार यदि संविधान के दायरे में रह कर दिल्ली की अन्य पिछली सरकारों से अच्छा काम करके दिखाती तो पूरे देश में उसकी तूती बोलती। अण्णा आंदोलन से प्रभावित जनता ने आम आदमी पार्टी को सिर-आंखों पर बैठा कर दिल्ली में लगभग पूरी विधानसभा सीटें और पंजाब में भी चार लोकसभा सीटें बड़ी आशा के साथ दी थीं। लेकिन हुआ क्या? खोदा पहाड़, निकली चुहिया और वह भी मरी हुई! झूठ, फरेब और चालाकी अधिक दिन नहीं चलतीं। जनता अब काफी जागरूक हो गई है और उसे आसानी से भ्रमित नहीं किया जा सकता। यदि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है और कई मामलों में यहां की सरकार के हाथ बंधे हुए हैं तो आम आदमी पार्टी को संविधान में परिवर्तन के लिए पूरे देश में अपना प्रचंड बहुमत लाना था, जो इतना आसान नहीं है। अच्छे ऐतिहासिक कार्यों की दमदार बानगी से ही यह संभव हो सकता है। बेकार की बहानेबाजी या किसी को ठुल्ला, पागल और मंदबुद्धि आदि कहने से यह कभी नहीं हो सकता, न मोदी और नजीब जंग जैसी शालीन, विनम्र हस्तियों के बारे में ओछी बयानबाजी से होगा। बहरहाल, अब भी सुधरने का वक्त है। जनता को काम प्यारा होता है, किसी पार्टी का नाम नहीं। सरकार के काम से ही आम आदमी पार्टी की साख बनेगी। (वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली)

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सोने का आकर्षण
सरकार स्वर्ण बांड योजना के जरिए देश में सोने के भौतिक उपयोग को हतोत्साहित कर उसे बांड के रूप में बदलने के लिए लोगों को आकर्षित कर रही है। इस प्रयास में कुछ हद तक सफलता भी मिली है लेकिन भविष्य में सोने का आकर्षण घट जाएगा, इसमें संदेह है। दरअसल,किसी भी योजना के प्रति आम लोगों का आकर्षण इस बात पर निर्भर करता है कि उससे देश के एक बड़े समुदाय का कितना हित जुड़ा हुआ है। इस नजरिए से देखें तो व्यापारी वर्ग ही स्वर्ण बांड योजना की ओर आकर्षित हुआ है जबकि एक बड़ा तबका, जिसमें ग्रामीण वर्ग आता है, अभी तक इससे दूरी बनाए हुए है।

यह बात ध्यान रखने योग्य है कि हमारे देश में आभूषणों की खरीदारी में पचास फीसद से ज्यादा की हिस्सेदारी ग्रामीण क्षेत्र की ही है और ग्रामीणों के लिए सोने का आकर्षण सिर्फ भौतिक स्तर पर नहीं है बल्कि इनके लिए सोना एक तरह से होमबैंक (घर का बैंक) का काम करता है जिसका वे अपने वित्तीय संकट के समय उपयोग करते हैं। लिहाजा, सरकार के लिए सोने का आकर्षण घटाना एक बड़ी चुनौती है। वह दो स्तरों पर काम कर सोने का आकर्षण घटा सकती है। पहले स्तर पर उसे ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बढ़ानी चाहिए, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवथा मजबूत होगी और लोग आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। इसके फलस्वरूप सोना रखने का कुछ मोह भंग हो सकता है। दूसरे स्तर पर महंगे और आकर्षक कृत्रिम जेवरात सस्ते दामों पर ग्रामीण क्षेत्रों तक ऑनलाइन मार्केट के जरिए पहुंचाए जाएं। ऑनलाइन खरीदारी का नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है। ऐसा करने से सरकार सोने का आकर्षण काम करके अपना खजाना भर सकती है जिससे अंतत: देश की संपूर्ण आर्थिक क्रियाओं में बढ़ोतरी होगी। (नीतीश कुमार, बेगूसराय, बिहार)

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