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इतिहास के जख्म

जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत के इतिहास का वह दर्दनाक मंजर है जो आजाद भारत को कोसते वालों को बताता है कि गुलामी की त्रासदी कैसी होती है और हमने कितने बलिदानों के बाद आजादी को प्राप्त किया है।

Author Published on: April 13, 2019 2:57 AM
जघन्य कांड के खलनायक डायर को 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने लंदन के केक्टस हाल में गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया था। (फोटो सोर्स- Vajiram & Ravi, फेसबुक पेज)

जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत के इतिहास का वह दर्दनाक मंजर है जो आजाद भारत को कोसते वालों को बताता है कि गुलामी की त्रासदी कैसी होती है और हमने कितने बलिदानों के बाद आजादी को प्राप्त किया है। ठीक सौ साल पहले आज ही के दिन 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का पर्व मनाने के लिए एक बाग में एकत्रित निर्दोष लोगों पर अंग्रेज जनरल डायर के इशारे पर बाग के मुख्य द्वार को बंद कर की गई अंधाधुंध गोलीबारी से सैकड़ों लोग मारे गए थे। ब्रिटिश दस्तावेजों के मुताबिक 400 लोग मरे थे जबकि भारतीय आकलन के मुताबिक 1000 लोग मरे थे और 1500 से अधिक घायल हुए थे। जिस बाग में यह सभा हो रही थी उसका रास्ता इतना संकरा था कि जो लोग जान बचा कर भागना चाहते थे वे भी कुचलने और घिरने से मर गए।

जब-जब बैसाखी का पर्व आता है इस हत्याकांड के जख्म ताजा हो उठते हैं। इस हत्याकांड के 100 साल पूरे होने पर हालांकि ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस घटना पर अफसोस जताते हुए इसे भारत-ब्रिटेन के इतिहास का शर्मनाक दाग बताया है। लेकिन उन्होंने इसके लिए माफी नहीं मांगी है। इससे पहले 2013 में भारत दौरे पर आए ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी इस हत्याकांड पर खेद जता चुके हैं। इस हत्याकांड की शताब्दी पर ब्रिटिश संसद में मंगलवार को माफी प्रस्ताव लाया गया जिसका सभी सांसदों ने समर्थन किया।

इस जघन्य कांड के खलनायक डायर को 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने लंदन के केक्टस हाल में गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया था। जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीड़ितों में उधमसिंह भी एक थे। उन्हें भी गोली लगी थी। इस घटना के बाद से ही वे डायर से बदला लेने की फिराक में थे। उधमसिंह के इस कदम की कई विदेशी अखबारों ने तारीफ की थी। आम लोग और क्रांतिकारी इससे गौरवान्वित हुए। 1940 में इस हत्या के लिए उधमसिंह को फांसी की सजा दी गई। उन्होंने अपने मृत्यु पूर्व बयान में कहा था कि मुझे मृत्यु का डर नहीं है; मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं। इस जघन्य हत्याकांड के 100 साल पूरे होने पर ब्रिटेन और दुनिया के तानाशाह शासकों की ओर इशारा कर इतना ही कहा जा सकता है कि सत्ता और राजनीति के लिए ऐसा कोई काम न करें कि समय गुजरने के बाद उसके लिए शर्मिंदा होना पड़े और माफी से बचने के लिए खेद की आड़ में छुपना पड़े। यह हत्याकांड आजादी और गुलामी के अंतर की याद दिलाता है। देश की आजादी और उसके लिए चुकाई गई कीमत के प्रति सदा नतमस्तक रहें। हो सके तो देश को संवारने में योगदान दें या फिर चुप रहें। यही जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।
’देवेंद्र जोशी, महेशनगर, उज्जैन

ईवीएम पर संदेह
लोकतंत्र के उत्सव यानी आम चुनाव के पहले चरण में 11 अप्रैल को नागरिकों ने अपने मताधिकार का उत्साहपूर्वक प्रयोग किया। इस सबके बीच देश के विभिन्न क्षेत्रों से ईवीएम की खराबी और मतदान में विलंब की खबरें भी सुनने में आर्इं। तकनीकी बाधाओं से जहां मतदाताओं में निराशा बढ़ी वहीं ईवीएम पर भरोसे को गहरा आघात पहुंचा। ऐसी स्थिति में मतदान कर्मियों और चुनाव अधिकारियों की परेशानियों को बखूबी समझा जा सकता है। जनतंत्र की मजबूती के लिए ईवीएम पर बने संदेह का पुख्ता निराकरण कर लोगों की भावनाओं का खयाल रखना चाहिए।
’अमन नवाज, नालंदा विश्वविद्यालय, पटना

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