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बिहार की बिसात

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का महागठबंधन से अलग होना, प्रधानमंत्री मोदी का फिल्मी अंदाज में 1 लाख 25 हजार करोड़ का पैकेज देना, पटना की रैली में लालू का खुलकर..

Author नई दिल्ली | November 4, 2015 9:45 PM
पटना के एक मतदान केंद्र पर वोट देने के लिए लाइन में खड़ी महिलाएं। (पीटीआई फाइल फोटो)

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का महागठबंधन से अलग होना, प्रधानमंत्री मोदी का फिल्मी अंदाज में 1 लाख 25 हजार करोड़ का पैकेज देना, पटना की रैली में लालू का खुलकर यादव-यादव जाप करना, सपा का नाटकीय ढंग से महागठबंधन से बाहर निकलना, ओवैसी का मुस्लिम बहुल इलाकों में अपने प्रत्याशी उतारना, सपा का राकांपा के साथ मिल कर सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा करना और सबसे महत्त्वपूर्ण तमाम तल्खियों के बावजूद राजग का अपना कुनबा बचाए रखने में सफल होना! पिछले दिनों में हुए इस घटनाक्रम ने न सिर्फ हमेशा दिलचस्प बिहार की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

महागठबंधन जब तक ‘महा’ था और उसके संभावित वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका नहीं थी तब तक उसका पलड़ा भारी लग रहा था लेकिन मौजूदा हालात दूसरी ही तस्वीर बयान कर रहे हैं। राजग के पास नीतीश की विकास-पुरुष की छवि की काट के लिए प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा तो है ही, नीतीश-लालू के मुस्लिम, यादव और अन्य पिछड़ी जातियों के समीकरण के जवाब में सवर्ण, दलित और महादलित का ठोस समीकरण भी है। इसके अलावा ओवैसी के अपने उम्मीदवार उतारने से महागठबंधन के मुस्लिम वोटों का बिदकना तय माना गया है क्योंकि मुसलमानों का एक वर्ग ओवैसी के साथ आकर भाजपा और संघ की हिंदुवादी आक्रामकता का जवाब देना चाहेगा। लालू का यादव वोट बैंक भी अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं दिख रहा है।

एक दौर था यादवों के नेता सिर्फ और सिर्फ लालू यादव थे लेकिन आज इस समुदाय में रामकृपाल यादव, पप्पू यादव, नंदकिशोर यादव भी सेंध लगा रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछले लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से लालू की बेटी मीसा भारती का रामकृपाल यादव से हारना है जबकि इस क्षेत्र में यादवों की संख्या अन्य किसी भी जाति से अधिक है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि यह बिहार है, यहां वक्त से तेज समीकरण बदलते हैं। फिलहाल मुकाबला कमोबेश बराबरी का लग रहा है पर कब क्या हो जाए, कौन जानता है! (राहुल रंजन, नोएडा)

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कैसी राजनीति:

सन 2014 से पहले भाजपा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध करती थी लेकिन अब वह इसका समर्थन कर रही है। उधर कांग्रेस सत्ता में रहते हुए तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का समर्थन करती थी लेकिन अब उसका विरोध कर रही है। यह कैसी राजनीति है? ऐसी राजनीति से तो कोई भी दूरी बनाना ही उचित समझेगा। यदि सभी राजनीतिक दल जनता के हित को ऊपर रखें तो ठीक है। लेकिन सियासी स्वार्थों के चलते ऐसा होना ही नहीं है। यदि ऐसा हो गया तो सरकार और विपक्ष दोनों संकट में जो आ जाएंगे! (धरमेंदर बघेल, सोल (डीयू), दिल्ली)

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समता का तकाजा: 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण खत्म होना चाहिए। इस पर हमें सोचना होगा कि क्या वाकई ऐसी स्थिति आ गई है कि आरक्षण खत्म करने की शुरुआत कर देनी चाहिए? हकीकत तो यह है कि आरक्षण लागू होने के दशकों बाद भी पिछड़ों और दलितों को व्यावसायिक और विशिष्ट उच्च शिक्षा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। आरक्षण का मकसद यही था कि सामाजिक रूप से पिछड़े तबके के लोगों को एक अवसर दिया जाए जिससे उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर में बदलाव आ सके। लोग सोचते हैं कि सरकार बेहतरीन सेवाओं में ऐसे छात्रों को आरक्षण देकर प्रतिभाशाली छात्रों के साथ भेदभाव करती है। हमें समझना होगा कि अभी पिछड़े वर्ग के छात्रों को इतनी सुविधाएं नहीं मिलतीं कि वे बाकी समृद्ध छात्रों का मुकाबला कर सकें।

आरक्षण के खिलाफ एक तर्क और दिया जाता है कि ऐसे चिकित्सक से कोई क्यों इलाज कराएगा जो परीक्षा में बहुत कम नंबर प्राप्त करके डॉक्टर बना है। हम भूल जाते हैं कि आरक्षण केवल प्रवेश परीक्षा में होता है। सेमेस्टर की परीक्षाओं में छात्र की वास्तविक प्रतिभा का मूल्यांकन समान तरीके से होता है। ऐसे में अगर कोई छात्र काबिल नहीं है तो वह परीक्षा पास ही नहीं कर पाएगा डॉक्टर बनना तो दूर की बात है। इसलिए हमें आरक्षण के सभी पहलुओं को समझना होगा। हां, आरक्षित वर्ग के जो छात्र आर्थिक रूप से समृद्ध हैं उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किए जाने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन इसके साथ ही इंटरव्यू और नियुक्तियों में पिछड़े तबके के अभ्यर्थियों के साथ होने वाला भेदभाव बंद होना चाहिए। पूरे देश में एकसमान शिक्षा पद्धति भी लागू होनी चाहिए तभी समाज में वास्तविक समानता आ पाएगी। फिर आरक्षण की प्रासंगिकता खुद ब खुद खत्म हो जाएगी। (मन्शेष कुमार, आइआइएमसी, नई दिल्ली)

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लोकतंत्र का मजाक:

भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है और यहां सभी देशवासियों को स्वतंत्र रूप से अपनी बात कहने की आजादी है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। लेकिन विडंबना देखिए कि जब एक व्यक्ति अपने विचारों को खुल कर सामने रखता है तो उसे पाकिस्तान जाने की सलाह दी जाती है। क्या पाकिस्तान भेज देना ही राष्ट्रभक्ति है? जो अपने मन की पीड़ा समाज और देश को बताना चाहता है उलटा उसे ही सलाह दी जाती है कि पाकिस्तान चला जाए! अगर मैं अपने मन की बात देश के सामने नहीं रख सकता तो हमारे मुल्क के स्वतंत्र होने या न होने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

ऐसा माहौल देश को पीछे की तरफ धकेल रहा है। कुछ असामाजिक तत्त्व लोकतंत्र का सरेआम मजाक बनाते रहे हैं। लगता है, इन पर किसी का बस नहीं चलता। इनका कुछ नहीं बिगड़ा और बिगड़ेगा भी नहीं क्योंकि प्रधानमंत्री खुद चुप हैं और भारत के लोकतंत्र का मजाक उड़ते हुए देख रहे हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री ने तो चुप रहने में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी पीछे छोड़ दिया है। मोदीजी, जनता ने आपको बहुत बड़ा जनादेश दिया है, इसका मतलब यह नहीं कि देश का मजाक बनते हुए देखेंगे। आपका फर्ज समाज में फैल रहे जहर को भी रोकना है। अगर यों ही सब कुछ चलता रहा तो पाकिस्तान समेत सारी दुनिया हमारा मजाक उड़ाएगी। (सत्यव्रत खुंगा, जींद, हरियाणा)

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