ताज़ा खबर
 

चौपालः बड़ी जीत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए खत्म कर दिया।

Author Published on: September 17, 2018 5:25 AM
लोगों के निजी जीवन और उनकी जीवन शैली के विकल्पों को लेकर समाज में भेदभाव नहीं होना चाहिए।

बड़ी जीत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए खत्म कर दिया। यह फैसला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लैंगिक अधिकारों की एक बड़ी जीत है। हमारा संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समानता के अधिकार पर विशेष बल देता है। इस कारण कोई समुदाय चाहे कितना भी छोटा हो, उसे उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि मानव सभ्यता के लिए इस प्रकार के संबंध कोई नई बात हों। हमारे यहां प्राचीन गुफाओं में इस प्रकार के संबंधों को लेकर अनेक चित्र उकेरे गए हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र में भी समलैंगिक व्यवहारों का जिक्र किया गया है। इतिहासकारों के अनुसार मेसोपोटामिया सहित कई प्राचीन सभ्यताओं और यूनानी देवताओं में भी इस प्रकार के संबंधों की बात कही गई है।

इससे साफ है कि समलैंगिकता कोई विकार नहीं है बल्कि स्वाभाविक यौन रुझान है। इस पर किसी पुरुष या महिला का नियंत्रण नहीं है कि वह किसकी तरफ आकर्षित हो जाए। परंतु समाज और हमारे देश के नीति निर्माताओं ने 158 वर्ष तक इन लोगों के स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार का दमन किया जो किसी भी अवस्था में उचित नहीं था। 1989 में डेनमार्क ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दी। 2000 में नीदरलैंड दुनिया का पहला देश बना जहां समलैंगिकता और समलैंगिक विवाह को मान्यता दी गई। लोगों के निजी जीवन और उनकी जीवन शैली के विकल्पों को लेकर समाज में भेदभाव नहीं होना चाहिए।

देवानंद, नई दिल्ली

पर्यावरण के साथ

दिल्ली में मुकर्जी नगर, राजेंद्रनगर, करोलबाग, लक्ष्मीनगर आदि कॉलोनियां वर्षों से कोचिंग संस्थानों का केंद्र रही हैं। ये संस्थान भारतीय प्रशासनिक सेवा आदि परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। इनके कर्ताधर्ता अपने प्रचार के लिए पर्यावरण के साथ अन्याय कर रहे हैं। वे अपने संस्थान के प्रचार के लिए लाखों की संख्या में पर्चे छपवाते और बंटवाते हैं। आश्चर्यजनक है कि ये संस्थान यह तक भूल जाते हैं कि जिस पर्यावरण संरक्षण का पाठ वे छात्रों को पढ़ाते हैं उसी पर्यावरण से खुद खिलवाड़ कर रहे हैं।
डिजिटलीकरण के दौर में कदम रख चुके भारत जैसे देश के लिए जरूरी है कि तकनीक का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए करे। कागज के प्रयोग पर नियंत्रण रखे, छपाई की इंक से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करे और अधिकांश प्रचार-प्रसार डिजिटल माध्यम से हो।

करन तिवारी, मुरैना, मध्यप्रदेश

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपालः हमारी भाषा
2 चौपाल: आस्था के शिकारी
3 चौपाल: हार का सबक
जस्‍ट नाउ
X