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चौपाल: ये रत्न

पुरस्कार उन व्यक्तियों की गरिमा बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं जो किसी वजह से पहले से चर्चा में न रहे हों। भाजपा कहती है कि डॉ भीमराव आंबेडकर को उसके कहने से भारतरत्न मिला और मायावती कहती हैं कि उनके कहने से मिला।

Author April 16, 2018 3:36 AM
डां. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू में हुआ था।

पुरस्कार उन व्यक्तियों की गरिमा बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं जो किसी वजह से पहले से चर्चा में न रहे हों। भाजपा कहती है कि डॉ भीमराव आंबेडकर को उसके कहने से भारतरत्न मिला और मायावती कहती हैं कि उनके कहने से मिला। ये परले दर्जे की नादानी की बातें हैं। डॉ आंबेडकर को भारतरत्न इसलिए मिला कि वे इसके काबिल थे। वैसे नहीं भी मिलता तो उनकी प्रतिष्ठा से इसका कोई ताल्लुक नहीं क्योंकि वे उन ऊंचाइयों पर स्थापित हो चुके थे जहां व्यक्ति किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं रहता। वैसे डॉ आंबेडकर को यह अलंकरण उन वीपी सिंह की सरकार के दौरान मिला जिन्हें मंडल की राजनीति सुहाई और जो कमंडल की राजनीति के धुर विरोधी थे। यों गांधीजी को शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला लेकिन पूरी दुनिया शांति के इस मसीहा से परिचित है। गांधीजी दुनिया के उन आठ लोगों में से एक हैं जिनकी उक्ति न्यूयॉर्क में ‘स्टेचू ऑफ लिबर्टी’ की दीर्घा में अंकित है। तभी तो अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधीजी के विषय में कहा था- ‘आने वाली पीढ़ियों को इस पर यकीन नहीं होगा कि धरती पर ऐसा भी हाड़-मांस का बना कोई आदमी कभी रहा होगा।’
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

पुनर्विचार की दरकार
इन दिनों तेलंगाना को छोड़ कर दक्षिण के सभी छोटे-बड़े राज्यों कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी ने केंद्र की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन राज्यों के वित्त मंत्रियों और अधिकारियों ने तिरुवनंतपुरम में एक दिवसीय बैठक में आरोप लगाए गए कि पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों से उनके प्रदेशों को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ेगा। अब तक 1971 की जनगणना को आधार मान कर राज्यों के साथ वित्त साझा किया जाता था। अब 2011 को आधार बनाया गया है जिससे बीमारू राज्यों को ज्यादा धन मिलेगा मगर दक्षिण के राज्यों को उनकी हिस्सेदारी के आधे से भी कम पैसे मिलेंगे। कहा जा रहा है कि केरल को अगले पांच वर्षों में बीस और तमिलनाडु को 40 हजार करोड़ का नुकसान होगा। इससे उन्हें कामकाज और विकास कार्यों को अंजाम देने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। यह दक्षिण के राज्यों के साथ न सिर्फ अन्याय है बल्कि सहकारी संघवाद के सिद्धांत का खिलाफ है। केंद्र इस पर तुरंत पुनर्विचार करे।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

उम्मीद का क्षेत्र
स्वतंत्रता के बाद कोई भी विकसित देश भारत के औद्योगिक विकास में मदद नहीं करना चाहता था और तत्कालीन भारतीय उद्यमियों के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वे बड़े उद्योग स्थापित कर सकें। उन्हें बुनियादी उद्योगों से तुरंत भारी मुनाफे की उम्मीद भी नहीं थी। इसलिए भारत सरकार ने जनता के धन से सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना की। सार्वजनिक क्षेत्र के कारण विकसित हुए बुनियादी उद्यमों और सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों के कारण भारी मुनाफा कमाने वाले पूंजीपति लंबे समय से इन सार्वजनिक उद्योगों को औने-पौने दामों में हथिया लेना चाहते हैं। इसके लिए पूंजीपतियों के नजदीकी राजनेता, नौकरशाह और तथाकथित अर्थशास्त्री लगातार सार्वजनिक क्षेत्र के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी क्षेत्र ने 2008 के मंदी के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की रक्षा की थी, जिसे सरकार समाप्त करने पर तुली है। देश की रक्षा के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा करना बहुत जरूरी है, नहीं तो भारत में शोषण का दायरा बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान की पूरी आशंका है।
’हरेंद्र सिंह कीलका, सीकर

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