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चौपालः विषमता का विकास

विकास एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कभी भी कोई एक मत नहीं हो सकता। सवाल है क्यों? विकास को लेकर हमेशा दो राय बनी रहेगी और लगातार इस पर बहस भी होती रहेगी।

विषमता का विकास

विकास एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कभी भी कोई एक मत नहीं हो सकता। सवाल है क्यों? विकास को लेकर हमेशा दो राय बनी रहेगी और लगातार इस पर बहस भी होती रहेगी। इसमें यह समझना मुश्किल होगा कि क्या वाकई विकास हो भी रहा है। यही बात गरीब निचले तबके को विकास की योजनाओं से दूर रखेगी। यह एक ऐसा विषय है जिसे गहराई से समझने की जरूरत है। अविकसित क्षेत्र में साक्षरता दर तो बढ़ रही है, पर कहीं न कहीं आज भी वह शिक्षा से बहुत दूर है जिन्हें अपने अधिकारों तक के बारे में जानकारी नहीं है। यह बात उन झुग्गी-झोपड़ी वालों पर लागू होती हैं जिन्हें अन्य सेवाएं तो दूर, जीवन की मौलिक जरूरतें भी नहीं मिल पा रहीं, जिसमें पानी, रोटी, कपड़ा और मकान आदि शामिल हैं।

यही कारण है कि वे सरकार की योजनाओं के लाभों से बिल्कुल वंचित हैं। यही वजह है कि विकास का स्वरूप असंतुलित होता जा रहा है। जो किसान अपनी दैनिक जरूरतों को पांच सौ रुपए में पूरा कर रहा था, वही अब दो सौ रुपए में उसे काम चलाना पड़ रहा है। दूसरी ओर, एक अमीर जहां एक लाख से अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर रहा था, वहीं वह तीन लाख खर्च करने लगा है। विकास कहां और किसका हो रहा है, यह बात समझने के लिए है। जाहिर है, सरकार हमारी थाली में हमारा हक नहीं परोसेगी, हमें अपना हक लेना पड़ेगा। हमें जागरूक होने की जरूरत है योजनाओं के प्रति, कार्यों के प्रति, तभी हम विकास के स्वरूप में शामिल होंगे।

शादमा मुस्कान, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

फैसले के बाद

संस्कृति, सभ्यता और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि समलैंगिकता बीमारी या फिर अपराध है। समलैंगिकता की प्रवृत्ति तो मानव सभ्यता के साथ ही चलती आ रही है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कोई धर्म एवं अध्यात्म के खिलाफ नहीं है। धारा 377 को समाप्त करके न्यायालय ने किसी की आस्था पर चोट नहीं पहुंचाई है। सिर्फ चारदिवारी के भीतर दो वयस्कों के बीच रजामंदी से बन रहे संबंधों पर शासन के हस्तक्षेप को समाप्त किया है। अब आगे सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि अदालत समलैंगिक विवाह को मान्यता कैसे देगी! दूसरे, अदालत का एक और बड़ा फैसला आने वाला है धारा 497 को लेकर। देखने की बात यह है कि इसके आने के बाद हमारा रूढ़िवादी समाज कैसे व्यवहार करता है?

जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर