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सपनों में हिसाब

बजट के प्रस्ताव जब एक वर्ष के हों तो उसके एक वर्ष में आने वाले नतीजों के अनुमानों की चर्चा होनी चाहिए, न कि सरकार के कार्यकाल की समाप्ति के बाद तक के वर्षों की अवधि की।

Author नई दिल्ली | March 2, 2016 2:00 AM
लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अरुण जेटली। (पीटीआई फोटो)

वित्तमंत्री अरुण जेटली के वर्ष 2016-17 के बजट प्रस्तावों को अमीरों से टैक्स लेकर गांव, गरीब और कृषि के हित में लगाने को प्रचारित किया जा रहा है। यह सही है कि इस बजट में गांव, गरीब और किसानों को कुछ सपने दिखाए गए हैं, जिनके परिणामस्वरूप 2022 में कृषि उत्पादन दुगना होने का अनुमान लगाया गया है। बजट के प्रस्ताव जब एक वर्ष के हों तो उसके एक वर्ष में आने वाले नतीजों के अनुमानों की चर्चा होनी चाहिए, न कि सरकार के कार्यकाल की समाप्ति के बाद तक के वर्षों की अवधि की। इस सरकार का कार्यकाल 2019 तक का है। इसीलिए उपलब्धियों के अनुमानों को 2019 के चुनाव के बाद दर्शाया जा रहा है, ताकि चुनाव में इन प्रश्नों से बचा जा सके।

कॉरपोरेटों और बड़े घरानों के आयकर की सीमा तीस प्रतिशत से घटा कर पच्चीस प्रतिशत क्रमिक रूप से करने की घोषणा वित्तमंत्री 2015-16 के बजट में ही कर चुके हैं, ताकि प्रतिवर्ष बजट में बड़े घरानों को छूट का आरोप उन पर न लगे। औद्योगिक और व्यावसायिक घरानों को क्रमबद्ध सीधे पहुंचाए जाने वाले इस लाभ पर बजट प्रतिक्रियाओं में लगभग खामोशी है, जबकि काल्पनिक अनुमानों के ढोल पीटे जा रहे हैं।

बैंकों की गैर-निष्पादक आस्तियों में भी बहुत बड़ा हिस्सा औद्योगिक और व्यावसायिक घरानों का है, जिसकी वसूली के लिए कोई प्रभावी दिशा-निर्देश और नीति का अभाव इस बजट में नहीं है। बैंकों के पुन: पूंजीकरण के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान राशि का प्रावधान किया गया है।

वास्तव में अगर गांव, गरीब और कृषि की चिंता है तो कृषि लागत को कम करने, उपज के वाजिब दाम किसानों को प्राप्त होने, ग्रामीण मजदूरी की दर बढ़ाने, कृषि सहायक गतिविधियों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और गांव से शहर में पलायन को हतोत्साहित करने की नीति और योजनाओं पर तत्काल अमल किए जाने की आवश्यकता है, जिसके लिए बजट में कोई संकेत या प्रावधान नहीं है। यह बजट बेरोजगारी और बेतहाशा महंगाई बढ़ाने वाला है जो गांव और शहर दोनों के गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों की मुश्किलों को दोहरा करेगा। (सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर)

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शहर और गांव
हाल ही में मोदी सरकार ने प्रथम बीस स्मार्ट सिटी के नामों की घोषणा कर दी है, लेकिन आज हमें स्मार्ट सिटी से ज्यादा स्मार्ट गांव की जरूरत है। आज भी हमारा गांव मुख्यधारा विकास से बिल्कुल अलग है। आज भी हमारे भारतीय समाज में गांव के होरी और शहर के राय साहब के बीच का अंतर बहुत ज्यादा है, उनके बीच की असमानता की खाई बहुत गहरी और चौड़ी है। तो अगर आज हम केवल शहरों के स्मार्ट होने पर ध्यान देंगे तो कहीं न कहीं ये स्मार्ट शब्द के ‘सर्वांगीण विकास’ की अवधारणा पर प्रश्नवाचक चिह्न होगा!

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में लगभग सात लाख गांव हैं, जिनमें से कुछ ऐसे भी हैं जहां विकास अभी कोसों दूर है। तो हम जितना आर्थिक व्यय शहरों में करने जा रहे हैं, अगर उसका मात्र पचास फीसद भी गांवों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में लगा देते तो भारत एक मजबूत और विकसित देश के रूप में उभर सकता है। शहर की तो प्रवृत्ति है विकसित होने की, क्योंकि वहां लोग आमतौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति पहले से ही जागरूक होते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति के गणतंत्र दिवस पर आने पर शहरों की धूल साफ हो जाती है तो कहीं न कहीं ये परिलक्षित होता है कि शहर तो विकास करेगा ही। मगर गांव में तो कोई आने वाला है नहीं तो वहां वैसे भी कोई ध्यान नहीं देगा। इसलिए आज के समय की मांग यही है कि पहले हमें गांव को स्मार्ट बनाना होगा, फिर शहरों को। (हर्षित राज श्रीवास्तव, दिल्ली)

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अहं के सत्र
सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों और परियोजनाओं को लागू करने और विवेचन के लिए तीन सत्रों में सदन को आहूत किया जाता है, जिससे देश के विकास की क्रमिक अवस्था बनी रहे। लेकिन मौजूदा सत्रों से अमूमन इस बात का ज्ञान हो जाता है कि सत्रों का प्रयोजन अब ‘अहं’ को शांत करना रह गया है। राजनीतिक पार्टियां गहन मुद्दों को सदन में एक दूसरे के खिलाफ आरोप मढ़ने के प्रयोग में ला रही हैं। जिन विषयों का मूल्यांकन कर उन्हें इसे आगे बढ़ने का जरिया बनाना चाहिए, वे अब मात्र आरोपों के शोरगुल में सदन के स्थगन का कारण बन कर रह गए हैं।

राजनीतिक पार्टियों को इतिहास में झांकते हुए पिछले सत्रों से सीख लेनी चाहिए, जहां देश के नेताओं ने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए अपने स्वार्थों और अहं को इतर रखा और हर ज्वलंत मुद्दों का अवलोकन करते हुए उसे विकास के चरण में आगे बढ़ने का माध्यम बनाया। (खुशबू लाटा, जयपुर)

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देश पहले
जेएनयू परिसर में पिछले दिनों जो घटित हुआ, उसकी निंदा के साथ-साथ समीक्षा भी होनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में देश के टुकड़े करने वाले नारे लगाना या फिर आतंकियों के जघन्य कुकृत्यों के समर्थन में प्रदर्शन करना देशहित वाले ‘प्रवचन’ नहीं समझे जाएंगे। अगर वास्तव में ऐसे नारे लगे हैं तो देश की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली ताकतों की हर वर्ग द्वारा खुलकर भर्त्सना की जानी चाहिए। यों, अगर पहले दिन से ही जेएनयू परिसर में हुई घटनाओं की सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष ने भी एकजुट होकर भर्त्सना की होती तो यह अशांति दूसरी जगहों तक नहीं पहुंची होती। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्य विषयों में राजनीतिक दलों में मतभेद हो सकते हैं, मगर राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे संवेदनशील विषय को चुनौती देने वालों से निपटने के लिए सभी राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और जिम्मेदार नागरिकों का एकजुट होना और एकमत होना बहुत जरूरी है। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)

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