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कैसा विकास

भले ही जवाहरलाल नेहरू ने बड़े बांधों को तीर्थ कहा था लेकिन इन बांधों ने जिस तरह जंगल, खेत डुबाए और गांव उजाड़ कर लाखों लोगों को बेघर और बेरोजगार किया है वह प्राकृतिक और मानवीय तबाही की दर्दनाक कहानी है।

भले ही जवाहरलाल नेहरू ने बड़े बांधों को तीर्थ कहा था लेकिन इन बांधों ने जिस तरह जंगल, खेत डुबाए और गांव उजाड़ कर लाखों लोगों को बेघर और बेरोजगार किया है वह प्राकृतिक और मानवीय तबाही की दर्दनाक कहानी है। प्राकृतिक संसाधनों के विनाश और मानवीय पीड़ा की कीमत पर होने वाले निर्माण को विकास कहना कहां तक न्यायोचित है? यह लड़ाई पूरी तरह हार जाने के बावजूद सच्चाई तो यही है कि विकास की यह दिशा अमानवीय है जिस पर बहस के दरवाजे लगभग बंद होते जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने दावा किया था कि मोदी सरकार आने से प्रदेश को उसका पूरा हक मिलेगा। लो मिल गई पहली किस्त जिसमें 193 गांव डूब जाएंगे, गरीब आदिवासी बे-घर हो जाएंगे। चुनाव जीतने के लिए भले ही कुछ भी कह दिया हो, अब तो वे प्रदेश हित में आवाज भी नहीं लगा सकते। मोदी के सामने उनकी वही हालत है कि जबरा मारे और रोने न देय! जब पहले के उजड़े विस्थापितों का ही पुनर्वास पूरा नहीं हो सका है, आधा-अधूरा जो भी हुआ है वह गरीबों के साथ क्रूर मजाक है। एक तरफ मध्यप्रदेश सरकार दो दशक पहले सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह चुकी है कि विस्थापितों को देने के लिए उसके पास जमीन नहीं है वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उद्योगपतियों से कह रहे हैं कि जितनी जमीन चाहिए आकर नाप लो! स्पष्ट है कि जमीन तो है पर पूंजीपतियों के लिए है। जिन्हें विकास के नाम पर उजाड़ेंगे उनके लिए जमीन नहीं है।
यह निजाम तो दरअसल पूंजीपतियों का निजाम, पूंजीपतियों के लिए और उन्हीं के द्वारा संचालित निजाम है। इसी को लोकतंत्र समझने की मजबूरी दिख रही है क्योंकि किसी बड़ी लड़ाई के सूरते-हाल नजर नहीं आते। इससे बड़ा अभिशाप और क्या हो सकता है!
’श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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