ताज़ा खबर
 

चौपालः युद्ध के सामने

आर्मेनिया चीन के सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से ‘एक बेल्ट एवं रोड परियोजना’ का साझीदार देश है। इसके प्रति भारत के खुले समर्थन से चीन भी बौखला गया है और अब इसके दूरगामी प्रभाव भी देखने को मिल सकते है।

आर्मेनिया चीन के सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से ‘एक बेल्ट एवं रोड परियोजना’ का साझीदार देश है।

हॉबेल ने विश्व के समस्त मनुष्य प्रजाति को तीन भागों में बांटा है – काकेशायड, मंगोलायड एवं निग्रायड। ये तीन मुख्य प्रजातियां विश्व की तीन अलग-अलग महत्त्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं। बहरहाल, काकेशायड प्रजाति में अल्पाइन, भूमध्यसागरीय, नार्डिक, डिनारिक, पूर्वी-बाल्टिक, लैप, इण्डो-द्रविड़ और पॉलिनेशियन परिक्षेत्र की मानव प्रजातियां भी शामिल हैं। इसी काकेशायड क्षेत्र के दक्षिणी भाग में स्थित हैं पश्चिमी एशिया के दो देश- आर्मेनिया एवं अजरबैजान, जिनके बीच हाल के टकराव ने एक गंभीर वैश्विक संकट और यहां तक कि तीसरे विश्व युद्ध का संकेत दिया है।

दरअसल, इस लड़ाई का लंबा इतिहास रहा है। नागोर्नो-काराबाख स्वायत्त क्षेत्र को 1920 में अजरबैजान की सीमा में रूस की मदद से मान्यता दी गई थी। नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र भले ही अजरबैजान की सीमा में हो, लेकिन वहां निवास करने वाली अस्सी प्रतिशत से भी ज्यादा जनसंख्या आर्मेनिया की है। 1921 में ये दोनों देश सोवियत संघ के सदस्य भी बने, लेकिन इस क्षेत्र के लिए लड़ाई ने सोवियत संघ के विघटन के तीन साल पहले तब जोर पकड़ा, जब 1988 में इस नागोर्नो-काराबाख स्वायत्त क्षेत्र के विधान-मंडल ने आर्मेनिया में शामिल होने का प्रस्ताव पारित किया। फिर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद इस क्षेत्र में एक जनमतसंग्रह कराया गया, जिसे अजरबैजान ने नकार दिया और तब इस स्वायत्त क्षेत्र ने निर्णय लिया कि यह दोनों में से किसी भी देश में शामिल नहीं होगा। और अब 2020 में फिर से इस लड़ाई ने जोर पकड़ लिया है।

फिलहाल दोनों देशों की सेना के तनातनी के बीच छह सौ से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और अब यह लड़ाई विश्व की सभी ताकतों को दो ध्रुवों में बांटती दिख रही है। जहां एकतरफ अजरबैजान को तुर्की, पाकिस्तान एवं अमेरिका जैसे देशों ने अपना समर्थन दिया है तो दूसरी तरफ आर्मेनिया का फ्रांस ने खुल कर समर्थन किया है।आर्मेनिया का रूस के साथ रक्षा समझौता भी है, लेकिन अजरबैजान से अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिए रूस खुल कर किसी भी देश के समर्थन में नहीं आ रहा है। हालांकि इसने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता के प्रस्ताव को सामने रखा है।

भारत के इन दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। आर्थिक सहयोग के अलावा जहां आर्मेनिया में कई भारतीय प्रवासी मजदूर निवास करते हैं और विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई करते हैं, वहीं अजरबैजान में भारत का वार्ता-साथी भी है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण यातायात गलियारा भारत के मुंबई से यूरोप, अजरबैजान के रास्ते होकर जाता है, वहीं आर्मेनिया भारत को अपने चिर-प्रतिद्वंदी पाकिस्तान और तुर्की के प्रति-संतुलन में बहुत मदद करता है। भारत ने वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए आर्मेनिया का समर्थन किया है।

आर्मेनिया चीन के सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से ‘एक बेल्ट एवं रोड परियोजना’ का साझीदार देश है। इसके प्रति भारत के खुले समर्थन से चीन भी बौखला गया है और अब इसके दूरगामी प्रभाव भी देखने को मिल सकते है। इसी बीच फ्रांस एवं तुर्की के बीच वाक्-युद्ध छिड़ गया है। बहरहाल, स्थिति बहुत नाजुक बनी हुई है। जरूरत है कि संयुक्त राष्ट्र विकसित देश जैसे अमेरिका, फ्रांस, रूस के अलावा भारत और चीन जैसे देशों को साथ में लेकर आर्मेनिया-अजरबैजान के मुद्दे को शीघ्र सुलझाए, अन्यथा परिणाम पूरे विश्व के लिए बुरे हो सकते हैं।
’उद्भव शांडिल्य, दिल्ली विवि, दिल्ली

 

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चौपाल: भूख से जंग
2 चौपाल: इंसाफ की राह
3 चौपाल: हथियारों पर अंकुश
ये पढ़ा क्या?
X