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चौपालः रोजगार की खातिर

देश में जनसंख्या के साथ-साथ बेरोजगारी भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वक्त आ गया है कि सरकार रोजगार सृजन की दिशा में कारगर कदम उठाए वरना आने वाले समय में बेरोजगारी दर भयानक रूप ले लेगी।

Author July 10, 2018 4:29 AM
प्रतीकात्मक चित्र

रोजगार की खातिर

देश में जनसंख्या के साथ-साथ बेरोजगारी भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वक्त आ गया है कि सरकार रोजगार सृजन की दिशा में कारगर कदम उठाए वरना आने वाले समय में बेरोजगारी दर भयानक रूप ले लेगी। सरकार के साथ युवाओं को भी अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। हमारे शिक्षित युवा केवल सरकारी नौकरी की चाह रखते हैं। वे व्यापार में पूंजी निवेश कर जोखिम उठाने का साहस बिलकुल नहीं करना चाहते। अधिकतर लोगों की मानसिकता व्यापार के प्रति नकारात्मक बनी हुई है कि अगर व्यापार में नुकसान हुआ तो भरपाई कैसे की जाएगी? वे व्यापार से होने वाले फायदे के बारे में सोचना उचित नहीं समझते। ऐसे कई उद्योगपति हैं जो गरीबी से संघर्ष करके आज ऊंचे मुकाम पर पहुंचे हैं।

सरकारी नौकरी में पर्याप्त वेतन, अच्छी सुविधाओं के साथ-साथ स्थिरता बनी रहती है इसी वजह से पोस्ट ग्रेजुएट युवा भी चपरासी पद के लिए आवेदन कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्राइवेट नौकरी में ऐसा नहीं रहता। सबको सरकारी नौकरी देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। ऐसे में बेरोजगारी दर कम करने के लिए सरकार को कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाने पड़ेंगे। इसके लिए उद्योगपतियों को आगे लाने की जरूरत है। उद्योगों में रोजगार के लिए पदों का ज्यादा से ज्यादा सृजन किया जाए। कुशल, अकुशल श्रमिकों के साथ उच्च शिक्षित युवाओं को अच्छे वेतन पर नौकरी दी जाए।

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चीन, जापान आदि देशों में असंगठित क्षेत्र में भी लोगों को बेहतर सुविधाओं के साथ-साथ अच्छा वेतन मिलता है। वहां के लोगों का रुझान सरकारी नौकरी की तरफ नहीं रहता। देश के श्रम अधिनियम में सुधार किया जाए, शासकीय और प्राइवेट संस्था में समान योग्यता समान वेतन नीति लागू की जाए। इससे न सिर्फ देश में आर्थिक असमानता दूर होगी बल्कि लोगों का रुझान निजी संस्थानों की ओर भी बढ़ेगा।

’अमित पाण्डेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
हत्यारी भीड़

जब आदमी भीड़ बन जाता है तो लगता है कि उसके अंदर इंसानियत खत्म हो जाती है। भीड़ में शामिल शख्स जानवर का रूप लेकर किसी की हत्या तक करने पर उतारू हो जाता है। भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता इसलिए आदमी भीड़ में शामिल होकर अपराध करने से नहीं डरता। हाल ही में देश के कुछ प्रदेशों में भीड़ ने कई लोगों की जान महज अफवाहों के चलते ले ली या पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। हमारा संविधान हर नागरिक को स्वतंत्रता और जीने का मौलिक अधिकार देता है लेकिन किसी को भी सजा देने का अधिकार नहीं देता। अगर कोई दोषी है तो सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को है। इस तरह की घटनाएं हमारी इंसानियत पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

भीड़ को उकसाने में सोशल मीडिया ने एक अनियंत्रित घातक हथियार की तरह काम किया है। इसके मद्देनजर सरकार को सोशल मीडिया के लिए एक निगरानी तंत्र बनाना चाहिए ताकि हिंसा के लिए उकसाए जाने और अफवाहों को फैलने से रोका जा सके। सभी नागरिकों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि ऐसे अफवाह वाले संदेशों को न फैलाएं।

सुनील कुमार सिंह, मेरठ

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