चौपाल : प्रतिगामी प्रवृत्ति

भीड़तंत्र का उत्थान पिछले कुछ वर्षों से अक्सर देखने को मिल रहा है। कठुआ से लेकर हाथरस तक। दादरी से लेकर धातकीडीह तक। ऐसी बहुत सारी घटनाओं को भीड़ द्वारा जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है।

हाथरसहाथरस में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी।

भीड़तंत्र का उत्थान पिछले कुछ वर्षों से अक्सर देखने को मिल रहा है। कठुआ से लेकर हाथरस तक। दादरी से लेकर धातकीडीह तक। ऐसी बहुत सारी घटनाओं को भीड़ द्वारा जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। ऐसी भीड़ हत्यारों के जेल से छूटने पर गाजे-बाजे और फूल मालाओं से स्वागत करती है। कई बार मंत्री खुद उनके घर जाकर उनका अभिवादन करते हैं।

यह हमारे लोकतंत्र के बीच एक नई व्यवस्था पनप रही है, जो तालिबान एवं आईएस के नक्शे-कदम पर चल कर त्वरित न्याय, उसी स्थान पर, तथाकथित अपराधी को मार कर कर देता है। सबसे अजीब बात यह है कि भीड़ ताली बजाती है, न्याय-व्यवस्था को अपना काम करने से रोकती है। हमने देखा कि कैसे कठुआ मामले में भीड़ ने किस तरह का बर्ताव किया। पता नहीं कैसा नया भारत हम बना रहे हैं! कहीं हम बहुसंख्यवाद की त्रासदी की तरफ तो नहीं बढ़ रहे हैं?

सवाल है कि हमारे सामने देखते-देखते इस तरह का समाज बन रहा है और समाज के बुद्धिजीवी तबकों के अलावा न तो सत्ताधारी दलों को इसकी फिक्र है, न विपक्ष को इस मसले पर कोई जनांदोलन चलाने की जरूरत महसूस होती है। सत्ता पक्ष सफाई देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता है और विपक्ष ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया जाहिर कर और सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लेता है। समाज के बीच जाकर आम लोगों को इस तरह की वहशी मानसिकता से आजादी दिलाने का बीड़ा कौन उठाएगा!
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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