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चौपालः दम तोड़ती इंसानियत

बीते बुधवार को कर्नाटक के हुबली में एक अठारह वर्षीय युवक अनवर अली ने सड़क पर तड़प-तड़प कर अपनी जान गंवा दी।

Author Updated: February 4, 2017 3:20 AM
(Source: Youtube/Public TV)

बीते बुधवार को कर्नाटक के हुबली में एक अठारह वर्षीय युवक अनवर अली ने सड़क पर तड़प-तड़प कर अपनी जान गंवा दी। सड़क दुर्घटना में लहूलुहान युवा लगभग आधे घंटे तक मदद के लिए पुकारता रहा पर कोई आगे नहीं आया। दुख की बात यह है कि वहां मौजूद लोग घायल को अस्पताल पहुंचाने की जगह उसकी तस्वीर और वीडियो उतारने में लगे रहे। यह कैसा समाज है, जहां व्यक्ति तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देता है और लोग तमाशबीन बने उसे मरने के लिए छोड़ देते हैं! मरते हुए आदमी की तस्वीर और वीडियो शेयर करने में आनंदित होते ऐसे तमाशबीनों को एक बार पीड़ित की जगह किसी अपने की कल्पना करनी चाहिए जिससे उन्हें हालात की गंभीरता और दम तोड़ती इंसानियत का अंदाजा हो सके।

पुराने समय से चली आ रही व्यवस्था की कमियों के कारण और व्यर्थ के कानूनी पचड़ों से बचने के लिए शायद लोग पीड़ितों की मदद करने में परहेज करते हैं। यह एक पहलू तो हो सकता है पर ऐसा नहीं है कि सारी गलती व्यवस्था की ही है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार अब सड़क हादसों में पीड़ितों की मदद पहुंचाने वालों की पहचान और पता गुप्त रखा जाता है और मुकदमा होने की सूरत में उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाता। दिल्ली सरकार ने तो पीड़ित को मदद पहुंचाने वालों के प्रोत्साहन के लिए दो हजार रुपए के ईनाम की घोषणा भी हाल-फिलहाल में की है।
खासकर युवाओं का लोगों की मदद के लिए आगे न आना हमारे समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। सार्वजनिक परिवहन में बुजुर्गों के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे और मोबाइल में व्यस्त दिखते युवा अगली पीढ़ी को कैसा समाज देंगे, यह सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
आजकल के युवाओं की सोशल साइट्स पर लोकप्रिय होने की चाहत पागलपन की हद तक पहुंच गई है। हाल ही में दो छात्र रेलवे लाइन पर सेल्फी लेने के मोह में अपनी जान गंवा बैठे जिसकी खबर सभी समाचार पत्रों की सुर्खियों में रही। बीते साल सेल्फी लेने में लापरवाही के कारण हुई मौतों में भारत अव्वल रहा।
सोशल साइट्स की छद््म दुनिया में जी रही युवा पीढ़ी को ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ का चक्रव्यूह तोड़ना मुश्किल होता जा रहा है जिसका खमियाजा उनके साथ-साथ उनके परिवार और समाज को भुगतना पड़ रहा है।
’अश्वनी राघव, उत्तम नगर, नई दिल्ली

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