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चौपाल: तेल का खेल

सऊदी अरब तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का सबसे ताकतवर सदस्य है और दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक भी। रूस उन देशों में एक बड़ी हैसियत रखता है जो ओपेक के सदस्य नहीं हैं लेकिन तेल निर्यात करते हैं। ये दोनों ही पिछले कुछ समय से मिल कर काम कर रहे थे और उन्हें ओपेक प्लस कहा जाता है।

कोरोना वायरस के असर के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में भारी गिरावट।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से गिरे हैं। भारत के लिए यह राहत की खबर है। इसी साल यानी 2020 में ही दाम करीब 45 फीसद तक गिर चुके हैं। दाम गिरने की वजह रूस और सऊदी अरब के बीच टकराव है। सऊदी अरब तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का सबसे ताकतवर सदस्य है और दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक भी। रूस उन देशों में एक बड़ी हैसियत रखता है जो ओपेक के सदस्य नहीं हैं लेकिन तेल निर्यात करते हैं। ये दोनों ही पिछले कुछ समय से मिल कर काम कर रहे थे और उन्हें ओपेक प्लस कहा जाता है। ओपेक प्लस ने मिल कर यह तय कर रखा था कि ये सारे देश कुल मिला कर हर महीने कितना तेल निकालेंगे, ताकि कच्चे तेल का बाजार भाव एक सीमा से नीचे न गिर पाए।

इसके लिए जरूरी था कि सभी देश अपने लिए तय सीमा से ज्यादा तेल उत्पादन न करें। बल्कि समझौता तो यह भी था कि दाम गिरने पर ये देश अपना-अपना उत्पादन घटाएंगे भी। मार्च तक के लिए यह समझौता हुआ था। इसे आगे बढ़ाने पर बातचीत चल ही रही थी, लेकिन अचानक रूस ने न सिर्फ समझौता आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, बल्कि अपना तेल उत्पादन बढ़ाने का भी एलान कर दिया। इससे खफा सऊदी अरब ने भी अपने ग्राहकों के लिए तेल के दाम में रियायत देने और तेल उत्पादन बढ़ाने का भी एलान कर दिया।

भारत के लिए यह एक सुनहरा मौका बन कर आया, क्योंकि भारत को अपनी जरूरत का 80 फीसद से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से ही खरीदना पड़ता है। पिछले वित्त वर्ष यानी 2018-19 में 112 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत ने आयात किया था। चालू वित्तीय वर्ष में जनवरी तक ही 87.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत खरीद चुका है। कच्चे तेल के दाम में एक डॉलर की गिरावट से भारत के आयात बिल में 10700 करोड़ रुपए की कमी आती है। यानी करीब 30 डॉलर की गिरावट का अर्थ सरकार के लिए लगभग तीन लाख करोड़ रुपए की बचत। तेल के दाम में 10 डॉलर की गिरावट से भारत की जीडीपी में आधा प्रतिशत का असर पड़ता है, यानी देश की अर्थव्यवस्था में करीब 15 अरब डॉलर का इजाफा हो जाता है। दस डॉलर की गिरावट से भारत में महंगाई की दर 0.3 फीसद तक कम हो सकती है, यानी 33 डॉलर की गिरावट से महंगाई दर में करीब एक फीसद की गिरावट संभव है।

कच्चा तेल सस्ता होने का मतलब है पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के साथ-साथ तमाम उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल सस्ता होना। करीब-करीब हर फैक्ट्री में आने और वहां से निकलने वाला माल जिन ट्रकों पर ढोया जाता है उनका किराया भी डीजल के दाम से ही तय होता है। अगर किराया कम हुआ, कच्चा माल सस्ता हुआ तो मौजूदा हाल में कंपनियां मांग बढ़ाने के लिए दाम भी घटाने की सोचेंगी। दाम कम होता है तो खरीदार भी हाथ खोल कर खर्च करना शुरू करते हैं और इसी तरह कारोबार का चक्र घूमना शुरू करता है। ऐसे में कच्चे तेल के दाम गिरना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक शुभ साबित हो सकता है।
’संजीव कुमार, एमएस कॉलेज, सहारनपुर

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