चुनौतियों के बरक्स

संसार के तमाम देशों में कोरोना महामारी के कारण आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य बदला हुआ है।

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (Pixabay.com)

संसार के तमाम देशों में कोरोना महामारी के कारण आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य बदला हुआ है। दुनिया के सामने आज आतंकवाद, ग्लोबल वार्मिंग, जनसंख्या वृद्धि जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। कुपोषण, रंगभेद, जातिभेद, लिंग भेद, भुखमरी, मानवाधिकारों का हनन आदि समस्याएं भी मुंह बाए खड़ी हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार का गठन भी दुर्भाग्यपूर्ण है। इन वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए समान विचारधारा वाले देशों को आगे आकर नेतृत्व की बागडोर संभालनी चाहिए। विश्व में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए सक्रिय प्रयास की आवश्यकता है।
’ललित महालकरी, इंदौर

हार का जश्न!

किसी भी खेल में एक पक्ष की हार और एक की जीत होती ही है। जीतने वाली टीम और उसके समर्थक उसका जश्न भी मनाते हैं। मगर अगर देश के कुछ लोग दुश्मन देश की जीत और अपने देश की हार का जश्न मनाने लगें, तो उनकी देशभक्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल ही में क्रिकेट के एक मुकाबले में पाकिस्तान ने भारतीय टीम को हराया, जिस पर देश में कई स्थानों पर जश्न और आतिशबाजी की खबरें आर्इं, जो कि अत्यंत निंदनीय है। पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के समय से ही हमारे देश को क्षति पहुंचने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता। इन सबके बावजूद विचित्र है कि हमारे देश के कुछ लोग पाकिस्तान के पाले में खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से देश के विकास में योगदान करने के बजाय, इसकी सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा ही साबित होंगे।
’सुनील विद्यार्थी, मोदीपुरम, मेरठ

पढ़ाई और ढिलाई

अब धीरे-धीरे बच्चों के स्कूल खुल रहे हैं। इस बीच बहुत सारे बच्चों को मोबाइल की लत लग चुकी है, जिससे उनका पढ़ने में ध्यान नहीं लगता। कई तो चुपके-चुपके स्कूल मोबाइल भी ले जाते होंगे। बच्चों की मोबाइल से दोस्ती कोरोना के वक्त और अधिक हो गई, जिसकी वजह से अब बच्चे मोबाइल से दूर नहीं रह पाते। अब बच्चों के स्कूल खुल जाने से उनकी दिनचर्या बदल गई है। उन्नीस महीने के इस दौर में बच्चों के गणित और अंग्रेजी में सीखने का प्रतिशत गिरा है। अगले साल होने वाली दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में कुछ महीने बाकी हैं। अगर उनकी दिनचर्या पर ध्यान दिया जाए, तो थोड़ा फर्क जरूर दिखेगा। बच्चों के माता-पिता और शिक्षक अगर उनके मार्गदर्शक बनें और उन्हें उनकी पढ़ाई-लिखाई में मदद करें, तो उनकी दिनचर्या दुबारा ठीक हो सकती है।
’रिशु झा, फरीदाबाद, हरियाणा

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