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चौपालः बेटियों की सुध

प्रधानमंत्री ने रेडियो पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लालकिले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर भाषण के लिए जनता से सुझाव मांगे हैं।

Author August 9, 2018 4:26 AM
आज भी करीब 16 फीसद छात्राएं 15 से 17 साल की उम्र में स्कूल बीच में ही छोड़ देती हैं। इसके लिए आर्थिक, सामाजिक और छात्राओं की सुरक्षा जैसे कारण भी प्रमुख रूप से जिम्मेदार होते हैं।

बेटियों की सुध

प्रधानमंत्री ने रेडियो पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लालकिले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर भाषण के लिए जनता से सुझाव मांगे हैं। विडंबना है कि आजादी के 70 साल बाद भी समाज में महिलाओं की हालत ठीक नहीं है, यानी अभी भी देश की आधी आबादी अपने कई अधिकारों से वंचित है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि हर छह घंटे में एक लड़की के साथ बलात्कार की वारदात हो जाती है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की हालत बहुत खराब है। ऐसे में लालकिले से महिलाओं की स्थिति पर केंद्रित विचारों को जनता के समक्ष रखना चाहिए।

केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ से लड़कियों को सहारा तो मिलता है लेकिन आज भी करीब 16 फीसद छात्राएं 15 से 17 साल की उम्र में स्कूल बीच में ही छोड़ देती हैं। इसके लिए आर्थिक, सामाजिक और छात्राओं की सुरक्षा जैसे कारण भी प्रमुख रूप से जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो छात्राएं पढ़ाई करती हैं उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। छात्राओं के खेल-कूद पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। यही कारण है कि स्कूलों में छात्राओं का मेडल लाने का सपना पहले ही टूट जाता है। सरकारी और निजी भागीदारी से कई खेल अकादमियां बनाई तो गर्ईं लेकिन आज हालात ज्यादा अच्छे नहीं हैं। इसलिए ग्रामीण स्तर पर खिलाड़ी छात्राओं को प्रोत्साहित कर आगे लाने की आवश्यकता है।

महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

सुधार की राह

हमारे देश में तमाम प्रयासों के बावजूद उच्च शिक्षा हालत दयनीय बनी हुई है। आखिर इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं! यह स्थिति कुछ ऐसी है जैसे कोई डॉक्टर किसी मरीज का इलाज करता जा रहा हो और मगर उसे पता ही न हो कि वास्तव में रोग क्या है। हमारे यहां आजादी के बाद से अब तक शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग ही किए जा रहे हैं। कभी पढ़ने को मिलता है कि अमुक संस्थान का स्थान विश्व के शीर्ष दस संस्थानों या सौ संस्थानों में अमुक है और कभी वही संस्थान प्रगति में अचानक पिछड़ जाता है। यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति है। शिक्षा संस्थानों का दर्जा ‘मोबाइल एप’ से ‘रेटिंग’ द्वारा तय नहीं किया जा सकता।

शिक्षा के बारे में हम कहीं न कहीं हीन भावना के शिकार हैं और उससे उबर नहीं पा रहे हैं। हम अपने अतीत से लेकर वर्तमान तक देखें तो इस देश ने एक से एक महान वैज्ञानिक, दार्शनिक, शिक्षाविद और डॉक्टर दिए हैं लेकिन अब क्या होता जा रहा है? केवल विदेशी उद्धरण देने से उच्च शिक्षा का विकास नहीं होने वाला है, बल्कि अपने ही देश के जाने-माने शिक्षाविदों के सुझाए रास्ते पर चल कर ही कोई समाधान निकलेगा। तमाम तरह की समितियां बना देने से कोई रास्ता नहीं निकलेगा।

राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ

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