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चौपालः स्वच्छता का दायरा

स्वस्थ नागरिक ही देश के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। अगर देश में विभिन्न बीमारियों का घेरा बढ़ता जाएगा तो सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी अपना बजट बढ़ाना होगा, जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा।

Author July 11, 2018 04:49 am
प्रतीकात्मक चित्र

स्वच्छता का दायरा

स्वस्थ नागरिक ही देश के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। अगर देश में विभिन्न बीमारियों का घेरा बढ़ता जाएगा तो सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी अपना बजट बढ़ाना होगा, जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा। आज भारत में गंदगी और गंदे पानी से डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया आदि बीमारियों का मकड़जाल कम नहीं है। इन बीमारियों से देश के बहुत से राज्यों में बहुत से लोग जान से हाथ धो बैठे हैं।

देश को स्वस्थ रखने के लिए साफ-सफाई रखना बहुत ही जरूरी है। गंदगी चाहे कूड़ा-कर्कट की हो या फिर पर्यावरण की हो, कई बीमारियों की जड़ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी माना है कि भारत में हर माह प्रति व्यक्ति औसतन लगभग 6500 रुपए बीमारियों पर ही बर्बाद होता है। अगर साफ-सफाई समाज की प्राथमिकता में शुमार हो जाए तो गरीब लोगों के खून-पसीने की कमाई इलाज में बर्बाद होने से कुछ हद तक बच सकती है।

सरकारों और प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब गंदगी से फैलने वाली बीमारियां बेलगाम हो जाती हैं। उस समय भी महज कुछ मुआवजा या नया अभियान चलाने की घोषणा करके टाल दिया जाता है। स्मार्ट सिटी की सूची में जो शहर आए हैं, अगर उनकी जांच पारदर्शी या निष्पक्ष तरीके से की जाए तो उनमें कुछ शहर ऐसे भी सामने आएंगे, जिनमे सफाई-व्यवस्था का बुरा हाल होगा। स्वच्छता से देश में बीमारियों से छुटकारा मिलने के बाद तभी बेहतर कल आएगा, जब हर नागरिक इसके प्रति गंभीर हो।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

नशे का दायरा

बिहार में समाज को शराबबंदी से कुछ राहत मिली है, लेकिन नशामुक्ति अभी दूर है। चोरी-छिपे अभी भी शराब मिलती है, बिकती है और लोग पकड़ में भी आते हैं। इसके अलावा, नशे के अन्य विकल्प के नशीले पदार्थ भी धड़ल्ले से बिकते हैं और लोग उसका प्रयोग करते हैं। कानून यहां कुछ नहीं कर पा रहा है। सरकारी एजेंसी को नशीले पदार्थ के सेवन से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहिए। चोरी-छिपे बिकने वाले अन्य नशीले पदार्थ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। स्थिति तो यह है कि छोटे-छोटे बच्चे इसका सेवन करते नजर आते हैं।

समाज की मुख्यधारा से भटकाने के लिए नशीले पदार्थ प्रारंभिक चरण का काम करते हैं। इसके बाद बच्चों के बिगड़ने की संभावना बढ़ जाती है। जिस तरह शराबबंदी के लिए जोर-शोर से प्रयास किया गया और सरकार सक्रिय है, उसी तरह नशाबंदी के मुद्दे पर भी सक्रिय हो तो हमारा समाज अपेक्षाकृत अधिक सुंदर बनेगा। स्कूल कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी नशीले पदार्थ के लती न बनें, इसके लिए हर संभव प्रयास करने की आवश्यकता है।

मिथिलेश कुमार, भागलपुर

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