अहसासों की गिरफ्त

सबसे नायाब अगर कुछ दुनिया में इतना आवश्यक है किसी के लिए भी वह है अहसास।

Humanसांकेतिक फोटो।

सबसे नायाब अगर कुछ दुनिया में इतना आवश्यक है किसी के लिए भी वह है अहसास। चाहे व्यक्ति भावों से भरा हो या अभावों से, प्यार से भरा हो या नफरत से, साहस से भरा हो या भय से, सभी अवस्थाओं में उभर कर जो रस मन-वचन में आता है, वह है अहसास। यह उतना ही आवश्यक है, जितना प्राणी का इस संसार में होना। इसीलिए प्रकृति ने इसे खूब भर-भर कर हम लोगों के अंदर उड़ेला है। ऐसे ही नहीं हम लोग रिश्तों को निभा रहे हैं जिन्हें वास्तव में बनाए रखना बेहद कठिन प्रक्रिया है। इसका एकमात्र कारण है अहसासों का उमड़ना, चाहे वह अपनेपन के रूप में दिखे या असहाय की सहायता के रूप में या किसी की चाहत में उसे पाने के रूप में।

असल में अहसास के मायने की खोज तभी हो सकती है जब यह अनुपस्थित हो जाए। जैसे- आंखें देखें तो सब कुछ, पर पता ही न हो कि कहां उनको रुकना था, मिले तो हम सभी से, पर पता ही न हो कि कोई खास भी था उसके लिए। इसी प्रकार जिंदगी तो जी लिए किसी के साथ, पर पता ही न चले कि क्या जिया गया।

अगर अहसास न हो तो फिर क्या होगा बीच में जोड़ने के लिए? शायद जरूरत या अधिकतम लाभ, जो मिलाएगा एक दूसरे को, फिर तुरंत जुदा भी कर देगा। इस तरह तो सिर्फ बचेगी तो एक की गर्दन और दूसरे की तलवार और फिर अंत में तो बचेगी तो केवल तलवार, जिससे हम सिर्फ कुछ काट ही सकते हैं, कुछ जोड़ नहीं सकते, क्योंकि जोड़ने वाला तत्त्व था अहसास। इसलिए अहसास के होने से न तलवार की जरूरत है और न ही किसी की गर्दन की।

अहसास क्यों होता है? क्या सभी को देख कर होता है? कैसे होता है कि अहसास के चलते हम भावनाओं की गिरफ्त में आ जाते हैं? इस तरह के प्रश्न उभरते हैं। अब क्यों का जवाब तो शायद ही मिले, क्योंकि जवाब होता तो अहसास को रोका भी जा सकता था, पर यह तो होकर ही रहता है। यह अलग बात है कि इसे कुछ समय के लिए छिपा जरूर लें, पर होता तो है ही। इसी प्रकार जरूरी नहीं है कि यह सभी के लिए हो ही, क्योंकि यह होगा तभी, जब मन में हलचल होगी। हो सकता है कि मन का लगना, न शुरू हो जाए। अब भावनाएं इस तरह से उमड़ रही हो सकती हैं कि सब कुछ गिरफ्त में आ रहा हो, क्योंकि हम किसी के साथ रहना या जुड़ना चाह रहे होते हैं।

इसी प्रकार, हम रिश्तों को देख सकते हैं जो पूरी तरह से अहसास के कारण जुड़े होते हैं। हो सकता है कि मजबूरी भी इसका सबब हो, पर मजबूरी के कारण हम साथ हैं तो फिर वह संबंध कहां हुआ? इसलिए अहसासों को दबाने या छिपाने से बचना चाहिए, क्योंकि यह अनमोल रत्न जाहिर करने के लिए बना है। वैसे भी प्यार या रिश्ते छिपाए या दबाए नहीं जाने चाहिए, क्योंकि जीवन में इनका होना अति महत्त्वपूर्ण है। नहीं तो फिर जग इसी प्रकार घूमता रहेगा और हम भी साथ में घूमते रहेंगे, पर मिलेंगे कभी नहीं।
’हिमांशु प्रभाकर, फतेहपुर, उप्र

खेल की रफ्तार

इन दिनों मौसम में पतझड़ के चलते पेड़ों से पत्ते टूट कर बिखर रहे हैं। मगर साथ ही अहमदाबाद के नए-नवेले नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में विकेटों का गिरना देखने को मिला। गनीमत थी कि भारतीय टीम इस पतझड़ में अपेक्षाकृत कहीं अधिक मजबूती से खड़ी रही और दो दिनों से कम चलने वाले टैस्ट मैच में एक और सफलता अपनी झोली में डालने में कामयाब रही। इस मैच में अश्वनी के साथ ही अक्षर पटेल की कामयाबी सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी।

टैस्ट क्रिकेट के इतिहास में ऐसा विरले होता है जब एक ही दिन में सत्रह विकेटों गिरें और दूसरे ही दिन फैसला आ जाए। यहां पिच की आलोचना की जा सकती है, मगर यह कह कर भारत अपना बचाव कर सकता है कि कोई भी देश अपने खिलाड़ियों, खासकर गेंदबाजों के अनुरूप पिच बनाने से गुरेज नहीं करता है। मगर टेस्ट क्रिकेट की अपनी अहमियत, गंभीरता और उसके स्वरूप को देखते हुए ऐसे पिच बनने चाहिए, जहां खेल चार से पांच दिन तक चल सके। जो हो, यह संतोष करने का कारण जरूर हो सकता है कि गुलाबी गेंद वाले दिन-रात के इस मैच में दर्शकों को दो रात से ज्यादा स्टेडियम में रुकना नहीं पड़ा। वैसे दाद भी देनी होगी भारतीय स्पिनरों की, जिनके हाथों में जाकर गुलाबी गेंद ने इंग्लिश टीम पर कहर बरपा दिया।
’ज्ञानदेव मुकेश, कुर्जी, पटना, बिहार

आशंकाओं के बीच

एक खबर के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र की पहल पर कोविड टीके की पहली खेप अफ्रीकी देश घाना पहुंच गया। शायद बिना इस पहल के एक सौ तीस के करीब तीसरे विश्व के अविकसित देशों को यह टीका मिल पाना मुश्किल होता। कुछ यूरोपीय देशों और लैटिन अमेरिका में टीके की कमी के कारण टीकाकरण के काम में रुकावट आ गया है। लेकिन जिन देशों के पास यह उपलब्ध है, उनमें से अनेक देशों के लोगों में इसके प्रति संकोच और झिझक देखने को मिल रहा है। भारत में तो अब भी आधे से ज्यादा लोग टीका नहीं लगवाना चाह रहे हैं।

तमाम आंकड़े इसकी पुष्टि भी करते हैं कि लगभग सभी प्रदेशों में जितना लक्ष्य रखा गया था, उससे काफी कम टीके ही लग पाए हैं। इसके पीछे का कारण शायद यही है कि इसकी इम्युनिटी कितने दिनों की है, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। फिर इसके दुष्प्रभावों को लेकर भी एक तरह की आशंका बनी हुई है। झिझक का एक अन्य कारण यह भी है कि इसे लेने के बाद भी लोगों को तमाम रोकथाम के उपायों को पहले जैसा ही अपनाने की बातें सामने आ रही हैं। सरकार को लोगों की इन आशंकाओं को दूर करना होगा।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

तोल के बोल

राजनीति में सफल होने के लिए कुशल वक्ता होना बेहद जरूरी है। जब आप अपने आसपास के प्रति सजग होते हैं, तभी सटीक जानकारी रख पाते हैं। राहुल गांधी समय-समय पर अपने दिए बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। कई बार उनके बयानों में अपरिपक्वता झलकती है। उत्तर भारतीयों की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े करके उन्होंने न केवल अपनी छवि को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि कांग्रेस को सुरक्षात्मक मुद्रा में आने पर मजबूर कर दिया। अति उत्साह में दिए गए बयान में राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों को कमतर आंका। जबकि इतिहास गवाह है कि राजनीतिक उर्वरा शक्ति से संपन्न उत्तर भारतीयों ने देश का समय-समय पर प्रतिनिधित्व किया है।

भारत की राजनीति में एक बात को आवश्यक तौर पर स्वीकार करना होगा कि अगर किसी की समझ भाषा को लेकर समृद्ध नहीं है तो राष्ट्रीय राजनीति उनके लिए दूर का सपना है। नेताओं को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए। खासतौर पर तब तो और जब बहुत सारे लोग राजनीति में उनकी भावी भूमिका को लेकर उम्मीद लगाए बैठे हों।
’क्षमा सिंह, वाराणसी, उप्र

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