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अच्छे दिन किसके

भारत की सवा सौ करोड़ आबादी उन वायदों, दावों को याद कर रही है जो अच्छे दिनों के दम के साथ छप्पन इंच का सीना दिखा कर किए गए थे। न काला धन आया और न महंगाई कम हुई।

Author September 5, 2015 9:01 AM

भारत की सवा सौ करोड़ आबादी उन वायदों, दावों को याद कर रही है जो अच्छे दिनों के दम के साथ छप्पन इंच का सीना दिखा कर किए गए थे। न काला धन आया और न महंगाई कम हुई। सीमा पर हालात में भी कुछ खास सुधार नहीं आ सका। नतीजतन, दिल्ली दम की नहीं, कम की आजमाइश करने के लिए तत्पर हो गई। प्याज की चोरी अब मायने रखने लगी है। पहले प्याज घर आकर रुलाता था पर अब ठेले पर उसकी बुलंद कीमत की आवाज ही निशब्द कर देती है।

फिलवक्त वैट दरों में डेढ़ से दो फीसद का इजाफा कर दिया गया है। इससे रेस्तरां में खाना-पीना, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, तीन सौ की कीमत से ऊपर वाले जूते-चप्पल, दस हजार या अधिक कीमत वाले मोबाइल फोन- सब जेब पर हमला बोलने के लिए तैयार हैं। कुछ लोग जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं, वे 2020 तक आशियाने की बात को सपना मानकर आज भी फुटपाथ को हर रात बिछौना बनाने को मजबूर हैं। जहां तक मीडिया की बात है तो उसके लिए हर सरकार बुरी भी है और अच्छी भी, बस मौका होना चाहिए।

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पाकिस्तान की भारत को बार-बार डराने की कोशिशें जारी हैं फिर चाहे वे मौजूदा पाकिस्तानी रक्षामंत्री की ओर से हों या परवेज मुशर्रफ की ओर से। इतने पर भी भारत संबंधों का वास्ता देकर मामला शांत कराने की कोशिश कर रहा है जिसे एक सही पहल माना जा सकता है। पर अच्छे दिन आज भी भाषणों में ही शेष रह गए हैं। भाजपा नेता तो अब यह भी कहने लगे हैं कि अच्छे दिनों का जुमला जनता द्वारा मोदीजी पर चिपकाया गया। अजी क्यों ऐसे जुमले उछाल कर बिहार में खुद कमजोर हो रहे हैं, संभल जाइए!

जनता के मुताबिक हालांकि मोदी सरकार में खामियां हैं तो उसकी उपलब्धियां भी हैं। सभी महत्त्वपूर्ण देशों से रिश्ते सुधारने की कवायद उनमें अहम है। लेकिन पाकिस्तान आज भी भौहें तरेरे खड़ा है। कुछ लोग प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को केवल पूंजीपतियों के लिहाज से लाभदायक मानकर चल रहे हैं जबकि यह सही नहीं है। दरअसल, मोदी अन्य देशों से संबंध सुधारते हुए उन्हें भारत का बड़ा बाजार दिखाकर व्यापार के लिए लुभा रहे हैं। इस सबके इतर महंगाई पर लगाम लगाते हुए मोदी समेत उनकी पूरी टीम को प्रयास करने चाहिए ताकि लोगों में सरकार के प्रति सम्मान जग सके।

श्वेता तिवारी, लखनऊ

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