बेतुके बोल

कंगना रणौत का यह बयान कि आजादी हमें भीख में मिली है, सचमुच स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए या फिर निरंतर संघर्ष करते रहे हमारे देशभक्तों का घोर अपमान है।

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कंगना रणौत। फाइल फोटो।

कंगना रणौत का यह बयान कि आजादी हमें भीख में मिली है, सचमुच स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए या फिर निरंतर संघर्ष करते रहे हमारे देशभक्तों का घोर अपमान है। ख्याति बटोरने या सुर्खियों में रहने का यह कोई तरीका नहीं है। कलाजगत में रमिए और फिल्में बनाइए। देश के राजनीतिक इतिहास या स्वत्रंत्रता संग्राम के इतिहास से छेड़छाड़ न करें। फिल्मी दुनिया अलग है और स्वतंत्रता सेनानियों की दुनिया अलग।

दोनों को एक ही तराजू में न तोला जाय। इतिहास के बारे में गंभीरतापूर्वक कुछ पढ़ लिया जाय। आजादी हमें भीख में मिली थी, तो फिर यह अमृतोत्सव आदि मनाने की पहल किस खुशी में? अभी-अभी पद्म श्री मिला है। कुछ दिन तो रुकतीं। लगता है, ‘पहले तोल फिर बोल’ सूक्ति ऐसे नहीं बनी।
’शिबन कृष्ण रैणा, दुबई

विवादित किताब

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने एक किताब लिखी है, जिसने पूरे देश में विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि हिंदुत्व आईएसआईएस और बोको हराम के बराबर है। ये दोनों संगठन आतंकवादी संगठन हैं। यह एक घिनौना काम है। क्योंकि ये आतंकी संगठन हत्या, लूटपाट और महिलाओं को प्रताड़ित करने के लिए जाने जाते हैं और हिंदुत्व एक ऐसी संस्कृति है, जो शांति, भाईचारे और एकीकरण के लिए जानी जाती है।

सलमान खुर्शीद का यह विचार विभाजनकारी है। यह कांग्रेस की फूट डालो और राज करो की संस्कृति है। लेकिन अब इस देश के लोग कांग्रेस की नीति से परिचित हो गए हैं। सलमान खुर्शीद बिना किसी महत्त्व के नेता बन गए हैं, इसलिए उन्होंने पार्टी और देश में चर्चित होने के लिए अपनी किताब लिखी। लेकिन यह आने वाले चुनावों में कांग्रेस पार्टी के लिए समस्या पैदा करेगा। अगर सलमान खुर्शीद ध्रुवीकरण चाहते हैं, तो वह सपने में सो रहे हैं।
’नरेंद्र शर्मा, जोगिंदर नगर, मंडी

खुदकुशी का दायरा

देश के सोलह से अठारह की आयु के बच्चों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति से शासन,प्रशासन और पालक चिंतित हैं, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से इसकी संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। कोरोना काल के दौरान घरों में रहना तथा आनलाइन पढ़ाई हेतु एंड्रायड मोबाइल फोन का उपयोग करते रहने से बच्चे इसके आदी हो चले हैं। इंटरनेट के जाल में उलझने से माता-पिता से संवादहीनता, नकारात्मक समाचार तथा धारावाहिक देखना, संयुक्त परिवार को तजना, अधिक समय तक अकेले रहना, अत्यधिक पढ़ना, पालक की अत्यधिक अपेक्षाएं होना, परीक्षा में फेल होना, प्रेम प्रसंग, शारीरिक शोषण होना, इच्छापूर्ति न होना और परेशानी को खुल कर न कह पाना या दबाना आदि आत्महत्या के कारण हैं।

दरअसल, पारिवारिक दायित्व है कि बच्चे को बड़ा आदमी बनने हेतु प्रेरित करें, दबाएं नहीं, क्योंकि हर बच्चा बड़ा आदमी नहीं बन सकता। बच्चों की आत्महत्या में मध्यप्रदेश का नाम सबसे ऊपर रहना सर्वाधिक चिंतनीय है। आवश्यकता है उक्त वर्णित कारणों के समाधान खोजने की।
’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, तराना, उज्जैन

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