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दमन का तंत्र

सवाल यह है कि क्या अब आदिवासियों को मिटाने वाली ताकतों के खिलाफ बोलना भी घातक हो गया है।

Author नई दिल्ली | Published on: February 26, 2016 12:01 AM
APP नेता सोनी सोरी

हाल में छत्तीसगढ़ में जिस तरह आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी पर घातक रसायन से हमला किया गया, उससे एक बार फिर यह साबित हो गया है कि देश के आदिवासियों के हित और अधिकार की बात करना किसी के लिए जानलेवा भी हो सकता है। सत्ता, पूंजी और धर्म के गठजोड़ ने आदिवासियों की स्थिति को बदतर कर दिया है। देश में चारों तरफ उनका दमन हो रहा है। जल, जंगल और जमीन को छीन कर उन्हें आजीविका विहीन किया जा रहा है। यहां तक कि उनके जीने के अधिकार भी छीने जा रहे हैं। सरकार उनकी जमीन पूंजीपतियों को बांट रही है, जिसके चलते कॉरपोरेट-पूंजीपति आदिवासियों के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। धर्म के ठेकेदार आदिवसियों की पहचान को मिटा कर उन्हें अपने में मिलाने पर आमादा है। आदिवासी हमेशा से प्रकृति पूजक रहे हैं, उसे जबर्दस्ती वर्चस्व की धर्म-संस्कृति का पाठ पढ़ाया जा रहा है। परिणाम यह हो रहा है कि आदिवासियों की भाषा, साहित्य और संस्कृति खतरे में है।

सवाल यह है कि क्या अब आदिवासियों को मिटाने वाली ताकतों के खिलाफ बोलना भी घातक हो गया है। सोनी सोरी छत्तीसगढ़ में आदिवासी हक और अधिकार के लिए लड़ती रही हैं, उन्हें सत्ता, पूंजी और धर्म की ताकतों ने जिस तरह निशाना बनाया है, उसे आदिवासियों के अधिकार पर हमला ही कहा जाना चाहिए। आज आदिवासियों के पक्ष में खड़ी हर आवाज को ये ताकतें दबाना चाहती हैं। देश की शीर्ष ताकतें अपने हितों की पूर्ति के लिए आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। नक्सलवाद के नाम पर सत्ता-व्यवस्था उन्हें कुचल रही है। विकास के नाम पर पूंजीपति उनके संसाधन छीन रहे हैं। धर्म के ठेकेदार संस्कृतिकरण के नाम पर उनकी पहचान को मिटा रहे हैं। यानी देश का आदिवासी आज चौतरफा हमला झेल रहा है। आदिवासी दमन की यह गाथा क्या कभी रुकेगी? कैसी सरकारें हैं हमारी जो आदिवासियों को खत्म कर देने पर तुली हैं!
(पप्पू राम मीना, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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सबका देश
आज कुछ राजनीतिक पार्टियां यह जताने में लगी हैं कि केवल उन्हें ही देश की फिक्र है। हर एक राजनेता श्रेय लेने में लगा है। जिन्हें राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत भी ठीक से याद नहीं है, वे आज देश में अपने योगदान की बात करते हैं। खासकर वे लोग जिनकी दृष्टि में गांधी जैसे समाज सुधारक सही नहीं थे, जिसके नाम की वजह से अन्य देश भारत को जानने लगे थे और जानते भी हैं। गांधी की हत्या करवाने वाले लोग जब खुद को राष्ट्रभक्त बताते हैं तो यह हास्यास्पद लगता है। ऐसे लोग कई बार देश में दंगों और तनाव की वजह बनते हैं। इसलिए इनको राष्ट्रभक्त न समझ कर दंगाई या विचलन की स्थिति पैदा करने वाला कहा जाना चाहिए। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि कुछ लोगों ने किसी साजिश के तहत जाट आरक्षण आंदोलन का मामला क्यों उठा दिया। अब यह आंदोलन हिंसक हो गया है, जिसमें उन्नीस लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभी र रूप से घायल हुए। आम लोगों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जानमाल का भारी नुकसान हुआ।

बात सोच और नीयत की है। अगर सोच और नीयत साफ हो तो कोई भी नियम-कानून अच्छाई का रास्ता नहीं रोकता। इसके लिए आपसी समझ और भाईचारा होना अति आवश्यक है। देश का कोई भी धर्म नहीं चाहता कि देश के विकास में बाधा डाली जाए, लेकिन ये राजनीतिक गठजोड़ के मोहरे बन जाते हैं। लोग डिजिटल भारत तो चाहते है, लेकिन खुद डिजिटल जैसे आधुनिक नहीं बन पाते। तकनीक के साथ-साथ मनो-मस्तिष्क में भी अगर बदलाव संभव हो तो यकीनन भारत विकास के शिखर को छू सकता है। (हसन हैदर, जामिया मिल्लिया, नई दिल्ली)

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लोकतंत्र के सामने
एक दीवार जो हम लोगों ने राष्ट्रवाद का परचम फहराने के लिए खड़ी की, आज उसका इस्तेमाल कुछ लोग करने लगे हैं और इनके पीछे छिपे बैठे हैं। दीवार के उस पार झांक कर देखें तो ये राष्ट्रवादी लोग कौन हैं जो प्रमाणपत्र बांट रहे हैं तो बहुत कुछ साफ पता चलेगा। अगर किसी को लगता है कि अभिव्यक्ति का अधिकार संविधान में दर्ज है तो उन्हें अब थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। अब कुछ बोलना खतरनाक भी साबित हो सकता है। दीवार के उस पार छिपे बैठे और राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र देते कुछ लोगों की ताकत बहुत ज्यादा है। वहां उलटी गंगा बहती हैं। वे अपनी मर्जी से तय करते हैं कि कौन राष्ट्रभक्त है और कौन नहीं है! इसके बाद किसी को बुरी तरह मारना या छोड़ देना उनके अधिकार क्षेत्र में है! किसी को राष्ट्रद्रोही कहके सार्वजनिक रूप से मारने-पीटने के बाद उन्हें सम्मानित भी किया जा सकता है। यह दीवार जो काफी बड़ी हो चली है, शायद हम भूल गए हैं कि यह हम लोगों की ही उपज है। फसल बो दी, तो काटना भी पड़ेगा।
(अमित बठला, पानीपत, हरियाणा)

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नफरत के बोल
हरियाणा में करनाल से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी के कुछ बयानों ने वहां जातीय संघर्ष के ताजा आग में घी डालने का ही काम किया। आग लगाना तो बहुत आसान है, लेकिन उसे बुझाना बड़ा कठिन होता है। यह सब शायद ये लोग नहीं जानते। इनके लिए तो ऐसे जहर घोलने, घटिया बयानों और कार्यों से सुर्खियों में रहने का एक नया फैशन बन गया है। इससे पहले भी भाजपा के अनेक सांसदों और नेताओं ने अपने बेलगाम बयानों से देश के माहौल में कितना धार्मिक जहर घोला है जो किसी से छुपा नहीं है। यह सब पार्टी को दिखाई नहीं देता है। इसलिए भाजपा पर अब जनविरोधी और सांप्रदायिकता की मोहर बार-बार लग रही है जो इसके लिए घातक है। इसलिए पार्टी को समाज में भाईचारे और प्रेम को बनाए रखने के लिए तुरंत ऐसे लोगों पर लगाम लगाने की सख्त जरूरत है। (वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली)

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