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खतरे में बचपन

बाल मजदूरी के खिलाफ जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल बारह जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है।

सांकेति‍क फोटो।

बाल मजदूरी के खिलाफ जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल बारह जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का मकसद चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों से काम न करा कर उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए जागरूक और प्रेरित करना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि दो दशकों में पहली बार बाल श्रमिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। दुनिया भर में बाल मजदूरों का आंकड़ा अब सोलह करोड़ पहुंच गया है।

पिछले चार वर्षों में इस संख्या में चौरासी लाख की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 और 2016 के बीच, बाल मजदूरों की संख्या में नौ करोड़ चालीस लाख की कमी दर्ज की गई थी, मगर गिरावट का यह रूझान अब पलट गया है। हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण लाखों अन्य बच्चों पर जोखिम मंडरा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार खेत-खलिहानों में बाल मजदूरी करने वाले बच्चों का आंकड़ा सत्तर प्रतिशत है, सेवा क्षेत्र में बीस प्रतिशत और उद्योगों में दस प्रतिशत। इसी तरह पांच से ग्यारह वर्ष के लगभग अट्ठाईस प्रतिशत बच्चे और बारह से चौदह वर्ष की आयु के पैंतीस प्रतिशत बाल श्रमिक स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।

भारत सरकार ने बाल श्रम पर अंकुश लगाने के लिए कई कानून बना रखे हैं। बावजूद इसके आज भी लाखों बच्चों का बचपन मजदूरी में निकल जा रहा है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे स्तर पर होटलों, घरों व फैक्टरियों में काम कर या अलग-अलग व्यवसायों में मजदूरी कर लाखों बाल श्रमिक अपने बचपन को तिलांजलि दे रहें हैं। घरेलू कार्य के अलावा पटाखे बनाने, कालीन बुनने, वेल्डिंग करने, ताले बनाने, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीड़ी बनाने, ढाबों में झूठे बर्तन धोने जैसे कामों में बच्चे लगे हैं। इन्हें न तो समाज का कोई संरक्षण मिला है और न ही सरकारी स्तर पर प्रभावी रोक की कोई व्यवस्था है। बाल श्रम को केवल कानून बना कर ही नहीं रोका जा सकता। इसके लिए समाज और सरकार के स्तर पर मजबूत इच्छाशक्ति की दरकार है। तभी हम इस कुत्सित प्रथा से मुक्त हो सकेंगे।
’बाल मुकुंद ओझा, जयपुर

सवाल पहुंच का

आज गैजेट हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन गए हैं। लेन-देन हो, आॅनलाइन पढ़ाई हो, या कोई भी काम, बिना स्मार्टफोन या लैपटॉप के कुछ भी संभव नहीं है। यहां तक कि मनुष्य की अपनी पहचान के लिए भी ये अनिवार्य हो गए हैं। हर व्यक्ति मोबाइल से जुड़ गया है। तकनीक के बदलते दौर और वर्तमान महामारी जनित कारणों को देखते हुए स्कूली शिक्षा के संदर्भ में एक डिजिटल शिक्षा नीति जैसे मसले भी सामने आए। जब यह लगा कि ऐसा लंबे समय तक चलने वाला है तो आॅनलाइन कक्षाओं के विकल्प ने मूर्त रूप लिया। स्कूली-बस्ते की तरह मोबाइल भी अनिवार्य बन गया है।

पचहत्तर फीसद ई-साक्षरता अब हमारी उपलब्धियों में जुड़ गई है। राजनीति से लेकर तमाम वैश्विक सम्मेलन भी वीडियो कांफ्रेंसिंग से हो रहे हैं। जाहिर है, हमारे जीवन अब तेजी से डिजिटल दुनिया का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन सबके लिए डिजिटल पहुंच अभी भी बड़ी समस्या है। शहरी और ग्रामीण मिला कर आज भी करीब चालीस फीसदी बच्चों के पास मोबाइल फोन नहीं है। फिर जिस सामाजिक कौशल को विद्यार्थी कक्षाओं में बैठ कर आपसी मेलजोल और सामंजस्य से सीखता है, जिससे उसकी संवेदनाओं का जन्म होता है, क्या वह गैजेटों की दुनिया से संभव है?
’शोभा जैन, इंदौर

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