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सफाई की खातिर

सफाई की खातिर इन दिनों देश में जोर-शोर से स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। क्या नेता क्या उद्योगपति, सब झाड़ू थामे फोटो खिंचाते नजर आ रहे हैं। गांधीजी के जन्म दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस सफाई अभियान को शरू करके स्वच्छता का जो संदेश दिया है, वह बापू की विरासत को […]

Author November 4, 2014 12:29 pm

सफाई की खातिर

इन दिनों देश में जोर-शोर से स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। क्या नेता क्या उद्योगपति, सब झाड़ू थामे फोटो खिंचाते नजर आ रहे हैं। गांधीजी के जन्म दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस सफाई अभियान को शरू करके स्वच्छता का जो संदेश दिया है, वह बापू की विरासत को सहेजने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है। गांधीजी आजादी के आंदोलन के दौरान जब राजनीति के मोर्चे पर अंगरेजों से जूझ रहे थे, तब भी अपने आसपास की साफ-सफाई को लेकर उतने ही सचेत रहते थे और सड़क पर चलते हुए गंदगी दिख जाने पर खुद उसकी सफाई में जुट जाते थे। यह उस इलाके के लोगों के लिए एक बड़ा संदेश होता था और इसका असर यह दिखता कि आसपास के लोग साफ-सफाई के काम में शामिल हो जाते थे। गांधीजी की उसी सामाजिकता को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुद हाथ में झाड़ू उठाना जरूरी समझा, ताकि उसका संदेश सीधे जनता तक पहुंचे। लेकिन इसका महत्त्व तभी तक बना रह सकता है जब यह अपनी गंभीरता और निरंतरता नहीं खोए। ऐसी खबरें भी आर्इं कि भाजपा सरकार के कुछ मंत्री साफ-सुथरी जगहों पर जानबूझ कर बिखेरे गए कूड़े पर झाड़ू लगा रहे थे। जाहिर है, इस दिखावे का मकसद सिर्फ प्रचार पाना था और अगर यही हाल रहा तो इस अभियान का अंजाम भी पिछली सरकार द्वारा शुरू किए गए अभियान जैसा हो सकता है।

खुले में शौच की समस्या पर काबू पाने के लिए हर घर में शौचालय के साथ-साथ स्वच्छता के संदेश को प्रचारित-प्रसारित करने के मकसद से यूपीए सरकार ने ‘निर्मल भारत’ अभियान चलाया था। प्रधानमंत्री की ताजा पहल को उसी का विस्तारित रूप कहा जा सकता है। मगर अब तक के अनुभव यही हैं कि ऐसे अभियान ईमानदारी और प्रतिबद्धता के अभाव में थोड़े ही समय बाद दम तोड़ देते हैं। सरकारी महकमों से लेकर समाज तक में उसे लेकर उदासीनता का भाव नजर आने लगता है।

यह छिपी बात नहीं है कि अपने घर को साफ रखने वाले ज्यादातर लोगों को इस बात की फिक्र नहीं होती कि उनके दरवाजे के बाहर फैली गंदगी बजबजाती रहती है और उसके लिए वे खुद भी जिम्मेदार होते हैं। दरअसल, यह मान लिया जाता है कि सफाई का काम सिर्फ सरकारी महकमों का है। लेकिन क्या यह अपने नागरिक कर्तव्यों से मुंह मोड़ना नहीं है? इसके अलावा औद्योगिक कचरा भी एक बड़ी समस्या है, जिसने आज हमारे देश की गंगा और यमुना जैसी कई नदियों का स्वाभाविक जीवन छीन लिया है।

स्वच्छता या साफ-सफाई के नरेंद्र मोदी के अभियान से पैदा हुए संदेश का विस्तार अगर औद्योगिक कचरे पर भी काबू पाने में होता है, तो यह पहल शायद ज्यादा सार्थक होगी। बहरहाल, यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री जिस स्वच्छता को आंदोलन बनाने की बात कर रहे हैं, उसी काम में लगे लाखों सफाईकर्मियों के बदतर हालात और वेतन या दूसरी सुविधाओं पर ध्यान देना सरकारों को जरूरी नहीं लगता। इसलिए इनकी समस्याओं का भी तत्काल हल निकाला जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लालकिले से हर घर में शौचालय की जरूरत पर जोर दिया था। यह खुले में शौच की समस्या का हल है। मगर कानूनन पाबंदी के बावजूद आज भी देश के कई हिस्से में एक खास जाति के बहुत सारे लोग हाथ से मैला साफ करने के काम में लगे हुए हैं। यह किसी भी सभ्य समाज को शर्मिंदा करने के लिए काफी है। इस समस्या को जड़ से खत्म किए बिना स्वच्छता का कोई भी संदेश अधूरा रहेगा।

अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली

असमान शिक्षा

लाल्टू का लेख ‘समान शिक्षा के लिए’ (29 अक्तूबर) पढ़ा। उनके विचारों से शायद ही कोई बुद्विजीवी असहमत हो। इस आंदोलन से जुड़े साथी धन्यवाद के पात्र हैं। भारतीय शिक्षा नीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है वह देश और समाज के लिए चिंता का विषय है। शिक्षा का दिन-प्रति दिन व्यापारीकरण हो रहा है। गली-मुहल्ले में कोचिंग संस्थान और गैर सरकारी विद्यालय खुलते जा रहे हैं जहां वर्गीय आधार पर शिक्षा देकर असमानता की दीवार खड़ी की जाती है। समान शिक्षा का अधिकार केवल कहने को है। यह शिक्षा गरीब समाज के बच्चों का मजाक बना कर उन्हें बेरोजगार बनाने में अहम भूमिका निभा रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में ‘पड़ोस’ की कल्पना मन में वर्षों से है। अगर सरकार देश और समाज का हित चाहती है तो उसे ‘पड़ोस’ की अवधारणा पर बुने सपने को साकार करना ही होगा। इसके लिए देश के तमाम बुद्धिजीवियों को आवाज बुलंद करनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक आजादी और समानता की कल्पना करना निरर्थक है।

सिद्वार्थ दौनापुरी, दिल्ली

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