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मोदी की सियासत

मोदी की सियासत जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तब देश में अन्न की कमी थी। शास्त्रीजी ने इच्छा व्यक्त की कि अगर हम सब सप्ताह में एक शाम उपवास करें तो भूखों को खाना मिल सकता है। उनकी इस इच्छा को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। गोदाम में अन्न सड़ रहा था, लोग भूखे […]

मोदी की सियासत

जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तब देश में अन्न की कमी थी। शास्त्रीजी ने इच्छा व्यक्त की कि अगर हम सब सप्ताह में एक शाम उपवास करें तो भूखों को खाना मिल सकता है। उनकी इस इच्छा को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। गोदाम में अन्न सड़ रहा था, लोग भूखे मर रहे थे लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि मुफ्त में अनाज नहीं दिया जा सकता!

हमें समझना होगा कि देश किसी की सदिच्छा से नहीं बल्कि संविधान से संचालित है और भारतीय संविधान तत्त्वत: पूंजीवादी है जो ‘भारत’ (दैट इज इंडिया )और ‘इंडिया’ में फर्क को पहले पन्ने पर ही रेखांकित कर देता है। गांधीवादी, समाजवादी और कम्युनिस्ट इसे समझें या न समझें प्रधानमंत्री वाजपेयी की असहाय स्थिति (संविधान संशोधन के लिए गठित वेंकटचलैया समिति की सीमित सिफारिशों और अपेक्षाओं को लागू न करने की विवशता) से उपजे ‘ज्ञान’ से ‘परिवार’ के लोग इसे अच्छी तरह समझ चुके हैं। तभी तो तमाम आंतरिक विरोध के बावजूद ‘परिवार’ के मुखिया मोदी को कुछ और समय देना चाहते हैं। आकलन यह है कि अगले तीन वर्ष के अंदर राज्यसभा में और पर्याप्त संख्या में राज्य की विधानसभाओं में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। तब मोदी को या तो ‘परिवार’ छोड़ना होगा या तोड़ना होगा या फिर संविधान में अपेक्षित संशोधन करना होगा। परिवार के मुद्दों पर मोदी की चुप्पी का राज इसमें निहित है। मोदी के इतिहास और भूगोल के ज्ञान से हम लोग परिचित हैं। आर्थिकी पर उन्हें सुनना अभी बाकी है। सदिच्छाओं की बारिश और कार्यक्रमों की घोषणा कर वे जनता को भरमा रहे हैं पर व्यवस्था में तदनुरूप परिवर्तन के ठोस संकेत मिलना अभी शेष है।

लोकसभा चुनाव के दौरान जो लेखक फासीवाद के खतरे से जनता को रू-ब-रू करा रहे थे और जो विश्लेषक चुनाव के बाद तीस फीसद या अड़तीस फीसद की व्याख्या कर रहे थे, वे सब अब खामोश हैं गोया उन समस्याओं का समाधान हो चुका! दिल्ली में बलात्कार बदस्तूर जारी हैं। उपराज्यपाल जंग की नागरिक और पुलिस प्रशासन से कोई ‘जंग’ दिख नहीं रही है। कीमतें स्थिर जरूर हुई हैं पर किसी सरकारी नीति नहीं या आवक के कारण। उदारीकरण के मद्देनजर ऊर्जा क्षेत्र में तीव्र गति से निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश के शासन के आरंभिक वर्षों में बिहार के मीडिया की जो हालत थी, कुछ वैसी ही मोदी के मामले में दिल्लीवालों की दिख रही है।

विदेश से काले धन की वापसी का मामला अटक गया है। सरकार और कांग्रेस के बीच टेनिस जारी है। सीमा पर भी चीन और पाकिस्तान की छेड़खानी जारी है। मजदूर वर्ग की दशा बद से बदतर होती जा रही है और मोदी देश के तकरीबन तीस करोड़ मध्य-वित्त वर्ग की क्रय शक्ति पर गर्व कर रहे हैं! कांग्रेस से गांधी और ‘आप’ से झाड़ू झटक गांधी के नाम पर मोदी एक ओर स्वच्छता अभियान का आह्वान करते हैं तो दूसरी ओर मोहनदास की जगह मनोहरलाल उच्चारित करते हैं! पर सेना समेत जनता के सभी वर्गों में लोकप्रिय होने की मोदी की कवायद जारी है और वे सफल होते भी दिख रहे हैं।
यक्ष प्रश्न है कि मोदी ‘स्व’ में हैं या ‘मुखौटा’ धारण किए हुए? वर्तमान को समझने के लिए इतिहास का अध्ययन किया जाता है। 2001 में भुज में मुख्यमंत्री मोदी की भूमिका या फिर 2009 में नाथूला जाकर सैनिकों के साथ समय गुजारना उनके वर्तमान कार्य की स्वाभाविकता को रेखांकित करता है। लेकिन ‘परिवार’ में दीक्षित मोदी पर धार्मिकता का असर पर्याप्त है तभी तो वे चंद्रशेखर आजाद का नास्तिक होना जानकर उन पर हो रहे कार्यक्रम से अलग हो गए। यह भी काबिलेगौर है कि अमदाबाद में जितने पूजा-उपासना स्थलों को मोदी ने जनहित और नागरिक सुविधाओं की खातिर तुड़वाने का काम किया उतना शायद ही कोई दूसरा कर सके। रायसीना हिल्स के शिखर पर पहुंचते ही इतिहास में अमर होने की उत्कट आकांक्षा मोदी के मन में जन्म ले चुकी है।

अब कम्युनिस्टों की बारी है। उन्हें अपनी आसन्न भूमिका और कार्यक्रम पर नए सिरे से, मार्क्सवादी तरीके से विचार करने की जरूरत है।

रोहित रमण, पटना विश्वविद्यालय

सिर पर छत

आज तक किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया कि प्रत्येक व्यक्ति का बैंंक में खाता खुल जाए। इससे कई बच्चों के मन में अपने छोटे-छोटे कार्य करने की प्रेरणा पैदा हो सकती है जो एक शुभ संकेत होगा। अब मोदीजी को ‘सबके सिर पर छत’ की दिशा में काम करना चाहिए। रात में लोग खुले आसमान के नीचे सड़कों पर सोए रहते हैं; ट्रक आते हैं और पूरे परिवार को रौंद कर चले जाते हैं।

क्या गरीब भारतीयों की जान की कोई कीमत नहीं? रौंदने वाला भाग जाता है। यदि पकड़ा भी जाए तो उसे कुछ खास सजा नहीं मिलती। ऐसे में क्या हमारे मन में यह विचार नहीं आना चाहिए कि देश के हर नागरिक के सिर पर छत हो, कोई सड़कों पर न सोए?

कमल कौशि, पटपड़गंज, नई दिल्ली

 

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