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फरेब का जाल

इस ‘रामपाल कांड’ ने देश और उसके विचारवान लोगों के सामने कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल राष्ट्र के सामाजिक सोच में गिरावट का है। ‘आस्था’ जैसा पवित्र शब्द अब अपना अर्थ बदल चुका है। लाखों-लाख लोग, कुछ चतुरसुजान बाबाओं के हाथ अपनी आस्था गिरवी रख दे रहे हैं। इस गिरावट के कारणों […]

Author November 22, 2014 10:20 AM

इस ‘रामपाल कांड’ ने देश और उसके विचारवान लोगों के सामने कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल राष्ट्र के सामाजिक सोच में गिरावट का है। ‘आस्था’ जैसा पवित्र शब्द अब अपना अर्थ बदल चुका है। लाखों-लाख लोग, कुछ चतुरसुजान बाबाओं के हाथ अपनी आस्था गिरवी रख दे रहे हैं। इस गिरावट के कारणों पर विचार होना चाहिए। दूसरा सवाल है कि इन फरेबी बाबाओं को राजसत्ता से जुड़े राजनेताओं का खुला संरक्षण भी प्राप्त हो रहा है। मजे की बात यह कि इस तरह का संरक्षण देने में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं है।

रामपाल का अरबों का साम्राज्य कोई दो चार दिन में बना है क्या? और जब यह साम्राज्य बन रहा था तब ‘राजसत्ता’ को इसकी कोई जानकारी नहीं थी क्या? और, हरियाणा राज्य की वर्तमान ‘कार्यपालिका’ की समझ तो देखिए कि राज्य के हाईकोर्ट द्वारा, रामपाल को कोर्ट में हाजिर करने के आदेश के बावजूद, सरकार ने एक ‘मेडिकल बोर्ड’ बनाया। एक डिप्टी कमिश्नर के सामने रामपाल का मेडिकल करा कर, उसके बीमार होने का झूठा सर्टिफिकेट अदालत में दस नवंबर को पेश कर दिया था। अगर अदालत सख्ती नहीं दिखाती और उस झूठे सर्टिफिकेट को कूड़ेदान में नहीं डाल देती तो रामपाल आज सलाखों के पीछे नहीं होता।

यहीं से इस मसले के तीसरे सवाल, यानी कानूनी पहलू पर भी विचार करना जरूरी हो जाता है। उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी विचारक मान्टेस्क्यू ने राजसत्ता के पृथक्करण का सिद्धांत दुनिया को दिया था। यानी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में स्वतंत्र होना चाहिए। इस सिद्धांत को सबसे अच्छी तरह अमेरिका के संविधान में अपनाया गया है। भारत का संविधान बनाने वालों ने भी इसे अपनाया, लेकिन व्यवहार में इस सिद्धांत का अतिक्रमण भी होता रहा है।

कार्यपालिका विधायिका की मदद लेकर, न्यायपालिका के पर कतरने की कोशिश करने लगती है। भारत में पिछले दिनों लोकसभा ने एक बिल पास किया जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्तिके लिए ‘कोलेजियम’ प्रणाली की जगह ‘न्यायिक नियुक्ति आयोग’ बनाने का निर्णय हुआ है। इस आयोग में विधि मंत्री और नेता प्रतिपक्ष सदस्य होंगे, जो उच्च न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति करेंगे। मतलब यह कि जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका और विधायिका का भी हाथ होगा।

राष्ट्र का शुभ सोचने वाले संजीदा विचारकों को देखना चाहिए कि स्थिति गंभीर हो चुकी है। राजनीतिक सत्ता, आर्थिक सत्ता और धार्मिक सत्ता के केंद्रों पर काबिज मुट्ठीभर लोगों का एक नापाक गठजोड़ बनता जा रहा है, जो ‘सर्वसत्तावान’ होने की कोशिश में हैं। और बची-खुची उम्मीद, यानी न्यायपालिका की आजादी भी खतरे में है। आखिर एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने पिछले दिनों राज्यपाल का पद स्वीकार कर ही लिया है। यह गौरतलब है कि उनके बाद सेवानिवृत्त होने वाले मुख्य न्यायाधीश राष्ट्र को यह चेतावनी देकर विदा हुए हैं कि न्यायपालिका की आजादी खतरे में है।

’विजयेंद्र नाथ शर्मा, गाजियाबाद

 

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