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नापाक नीयत

भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता का हश्र हमेशा से क्या रहा है, क्या हो सकता है, यह पिछले हफ्ते के हाइवोल्टेज ड्रामे के बाद एक बार फिर साफ हो गया है। हर बार दोनों ओर की उदारवादी सोच यह दोहराती रही है कि ‘गुफ्तगू जारी रहे, बात से बात चले…।’ लेकिन इस प्रहसन के […]

Author August 25, 2015 5:49 PM

भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता का हश्र हमेशा से क्या रहा है, क्या हो सकता है, यह पिछले हफ्ते के हाइवोल्टेज ड्रामे के बाद एक बार फिर साफ हो गया है। हर बार दोनों ओर की उदारवादी सोच यह दोहराती रही है कि ‘गुफ्तगू जारी रहे, बात से बात चले…।’ लेकिन इस प्रहसन के बाद क्या कथित उदारवादी यह समझने का प्रयास करेंगे कि भारत-पाक के बीच सार्थक वार्ता की कितनी और गुंजाइश बची है, सिवाय बातचीत की कथित चोचलेबाजी को छोड़ कर।

एक माह पहले रूस के उफा में मोदी-शरीफ की मुलाकात के दौरान तय हुआ था कि मोदी सितंबर में पाकिस्तान जाएंगे लेकिन उसके पहले पाक प्रतिनिधि भारत आएंगे, ताकि बातचीत की ठोस जमीन तैयार हो सके। लेकिन किसी भी बातचीत के लिए जरूरी है कि नीयत साफ हो। दुर्भावना और दुर्गंध से सराबोर होकर जुबानी चर्चा और आवभगत करना अलग बात है, लेकिन इसे उपयोगी बनाना या परिणाममूलक बनाना दूसरी बात। बहरहाल, एक बात बड़ी साफ है कि दोनों मुल्कों के बीच कश्मीर ऐसा मसला है जिस पर एकराय से बातचीत की संभावना न के बराबर है। भारत इसे अपना ‘माथा’ मानता है तो पाकिस्तान ‘गला’। एक इसके सिर को काटना चाहता तो दूसरा शोर मचा रहा है कि उसने गला दबा रखा है!

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के हुक्मरान वहां के अवाम को गुमराह कर अपनी नाकामियों से मुंह छिपाते रहे हैं। बीते 68 साल में तीन बार मुंह की खा चुकने बाद भी पाक की दुम सीधी नहीं हो सकी है। अलबत्ता परमाणु शक्ति संपन्न होने के बाद प्रत्यक्ष युद्ध की गुंजाइश न्यून देख वह आतंकवाद के जरिए भारत में छद्म युद्ध से विकास कार्यों को अवरुद्ध करना चाहता है, जबकि खुद आतंकवाद से पीड़ित हो चला है।

एक सुखद कल्पना है कि अगर दोनों मुल्क अपनी सीमाओं की चौकसी में हुए अरबों के खर्च को विकास कार्यों में लगा पाते तो कश्मीर से कहीं अधिक खुशहाली दोनों ओर होती। इतना ही नहीं, एशिया में दोनों मिलकर विश्व को चुनौती दे सकते थे। इतनी-सी बात या तो हुक्मरान समझना नहीं चाहते या समझते हुए भी आपसी विद्वेष की अग्नि में धधक रहे हैं। यह बात दुखद है कि धर्म के नाम पर पहले एक मुल्क के दो भाग हुए और अब वे एक-दूसरे के रक्तपिपासु बने हुए हैं।

कहना न होगा कि जब हुक्मरान ही देश की जनता को गुमराह करें तो जनता को समझदारी दिखानी होगी। कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और रहेगा, यह मानकर पाकिस्तान भारत से रिश्ते बेहतर रख कर कहीं अधिक तरक्की कर सकता था। मगर हालिया हरकतें उसकी नापाक नीयत को उजागर करती हैं।
श्रीश पांडेय, प्रभात विहार, सतना

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