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भारतीय अर्थव्यवस्था पर खत्म हुआ नोटबंदी-जीएसटी का असर, 7.3 पर्सेंट की रफ्तार से बढ़ेगी GDP: वर्ल्ड बैंक

विकास दर साल 2019 और 2020 के लिए क्रमश: 7.3 और 7.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद है।भारत को वैश्विक बढ़त में साझीदार बनने का मौका मिलेगा।
वर्ल्ड बैंक ने देश में आर्थिक सुधारों की गति तेज होने की उम्मीद जताई है। प्रतीकात्मक चित्र

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए मंगलवार की सुबह राहत लेकर आई है। वर्ल्ड बैंक ने आज भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर साल 2019 और 2020 के लिए क्रमश: 7.3 और 7.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई है। वर्ल्ड बैंक ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब नोटबंदी और जीएसटी के असर से उबर चुकी है।

वर्ल्ड बैंक मानता है कि,’भारत में विकास दर साल 2017 में 6.7 फीसदी रही है। इसके 2018 में बढ़कर 7.3 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। अर्थव्यवस्था को उबारने में निजी निवेशकों और घरेलू खपत से स्थिर सहारा मिल सकता है। भारत को निवेश और निर्यात बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। इससे भारत को वैश्विक बढ़त में साझीदार बनने और उबरने का मौका मिलेगा। वर्ल्ड बैंक ने ये बातें अपनी ​द्विवार्षिक दक्षिण एशिया आर्थिक केन्द्र की रिपोर्ट में कही हैं।’

नौकरियां छोड़ रही हैं महिलाएं : भारत में नौकरी की संभावनाओं पर भी वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में चर्चा की गई है। वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि,’ हर महीने भारत में 13 लाख नए युवा नौकरी के लिए तैयार हो रहे हैं। इतने युवाओं को मौका देने के लिए भारत को हर साल 81 लाख नई नौकरियां देनी होंगी। लेकिन अगर 2005 से 2015 के रोजगार आंकड़ों का विश्लेषण करें तो इसमें लगातार गिरावट आई है। इसके पीछे बड़ा कारण यह भी है कि बड़ी संख्या में महिलाओं ने नौकरी करना छोड़ दिया है।

नोटबंदी और जीएसटी से हुआ नुकसान : रिपोर्ट के भारत वाले हिस्से में वर्ल्ड बैंक ने माना है कि,’ पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू होने की प्रकिया के दौरान हुए घटनाओं से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है। इस झटके का सबसे बुरा असर गरीबों और वंचित तबके पर ही हुआ है। लेकिन आज के हालात में, कारोबार अब पुरानी स्थिति में लौटने लगा है। अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले तत्वों और निवेश में बढ़ोत्तरी होने के कारण वित्तीय वर्ष 2019 में भारत की विकास दर 7.4 तक रहने की उम्मीद है।’

धीमी हुई है आर्थिक गतिविधियां : वर्ल्ड बैंक मानता है कि, ‘बीते वक्त में अ​र्थव्यवस्था में सुधार को गरीबी घटने से जोड़कर देखा गया है। लेकिन इसमें भी अल्पविकसित अर्थव्यवस्था होने के कारण जोखिम की मात्रा काफी अधिक है। ये गिरावट किसी एक कारण से नहीं आई है। पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने वित्तीय वर्ष 2016 में देश में अार्थिक गतिविधियों को बेहद धीमा कर दिया था।

गिर रही है विकास दर : वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट भी वर्ल्ड बैंक के दावों का समर्थन करती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत की वास्तविक विकास दर वित्तीय वर्ष 2016 में घटकर 7.1 प्रतिशत रह गई थी। जबकि यही वित्तीय वर्ष 15—16 में आठ फीसदी थी। बाद में वित्तीय वर्ष 2017 में ये औंधे मुंह गिरकर 5.7 फीसदी ही रह गई।

घरेलू खपत में हुआ इजाफा : वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में राहत देने वाली खबर भी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था गिर रही थी लेकिन जनता और घरेलू खपत में लगातार इजाफा हुआ है। इसके पीछे पहला कारण सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करना रहा। जबकि दूसरा सामान्य मानसून और खेती में सुधार के कारण ग्रामीण मांग में बढ़ोत्तरी होना है।

घट रही है किसानों की आय : सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि अगर जनता की कुल मांग को देखा जाए तो उसमें भी सुस्ती आई है। वहीं खेती में भी कृषि उत्पादकता की दर में भी गिरावट दर्ज की गई है। पिछले वित्तीय साल 2016 में ये दर 6.9 फीसदी रही है, जबकि वित्तीय वर्ष 2015 में यही दर 9.4 फीसदी रही थी।

बाजार से दूर हुए छोटे निवेशक : वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, अर्थव्यवस्था के लिए सबसे जरूरी मंझोले निवेशक हैं जो निजी पैसे से निवेश करते हैं। भारत में लगातार ऐसे निवेशकों की तादाद में कमी आ रही है। इसके पीछे कारण बैंक में कॉर्पोरेट कर्जों की वसूली लटकना, नियमों और नीतियों में लगातार बदलाव आना और अमेरिका में ब्याज दरों में उतार चढ़ाव होना बताया गया है।

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