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नोटबंदी और जीएसटी की वजह से कम रह सकती है भारत की वृद्धि दर: विश्वबैंक

भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर बनी चिंताओं के बीच विश्वबैंक ने उसकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर कम रहने का अनुमान जताया है।
Author वाशिंगटन | October 12, 2017 03:30 am
विश्व बैंक (फाइल फोटो)

भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर बनी चिंताओं के बीच विश्वबैंक ने उसकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर कम रहने का अनुमान जताया है। नोटबंदी और माल और सेवाकर (जीएसटी) को प्रमुख कारण बताते हुए उसने 2017 में भारत की वृद्धि दर सात फीसद रहने की बात कही है जो 2015 में यह 8.6 फीसद थी। विश्वबैंक ने यह चेतावनी भी दी है कि अंदरूनी व्यवधानों से निजी निवेश के कम होने की संभावना है जो देश की वृद्धि क्षमताओं को प्रभावित कर नीचे की ओर ले जाएगा। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने भी 2017 के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.7 फीसद कर दिया था। यह उसके पूर्व के दो अनुमानों से 0.5 फीसद कम है। जबकि चीन के लिए उसने 6.8 फीसद की वृद्धि दर बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
का अनुमान जताया है। अपनी द्विवार्षिक दक्षिण एशिया आर्थिक फोकस रपट में विश्वबैंक ने कहा है कि नोटबंदी से पैदा हुए व्यवधान और जीएसटी को लेकर बनी अनिश्चितताओं के चलते भारत की आर्थिक वृद्धि की गति प्रभावित हुई है। परिणामस्वरूप भारत की आर्थिक वृद्धि दर 2017 में सात फीसद रहने का अनुमान है जो 2015 में 8.6 फीसद थी। सार्वजनिक व्यय और निजी निवेश के बीच संतुलन स्थापित करने वाली स्पष्ट नीतियों से 2018 तक यह वृद्धि दर बढ़कर 7.3 प्रतिशत हो सकती है।

विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) की वार्षिक बैठक से पहले जारी इस ‘दक्षिण एशिया आर्थिक फोकस’ रपट में कहा गया है कि सतत वृद्धि से गरीबी कम होने की उम्मीद है। लेकिन इस पर अधिक ध्यान देने का ज्यादा फायदा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को मदद देने में मिल सकता है। विश्वबैंक ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ने का असर दक्षिण एशिया की वृद्धि पर भी हुआ है। परिणामस्वरूप दक्षिण एशिया पूर्वी एशिया और प्रशांत महासागर क्षेत्र के बाद दूसरे स्थान पर आ गया है। रपट में कहा गया है, जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर 2016 में घटकर 7.1 फीसद रही जो 2015-16 में 8 फीसद थी और वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में यह घटकर 5.7 फीसद पर आ गई है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद एक तरफ जहां सार्वजनिक और निजी उपभोग में वृद्धि हुई और अच्छे मानसून से कृषि और ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी हुई, वहीं दूसरी तरफ संपूर्ण मांग कम हो गई क्योंकि निजी निवेश कम होना शुरू हो गया। विश्व बैंक के अनुसार, जीएसटी से 2018 की शुरुआत तक आर्थिक गतिविधियों के बाधित रहने की संभावना है, लेकिन इनकी गति बढ़ सकती है। तथ्य दिखाते हैं कि जीएसटी के बाद विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में तीव्र संकुचन हुआ है। आर्थिक वृद्धि की गतिविधियों के एक तिमाही के भीतर स्थिर होने की उम्मीद है और यह 2018 में 7 फीसद की वार्षिक वृद्धि को बनाए रख पाएंगी। वर्ष 2020 तक आर्थिक वृद्धि के 7.4 फीसद पर पहुंचने का अनुमान है जो निजी निवेश में सुधार पर निर्भर करेगी।

 

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