नौकरी करने वाले लोगों के लिए ईपीएफ (Employees’ Provident Fund) रिटायरमेंट के बाद एक मजबूत आर्थिक सहारा होता है। यह योजना कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत चलती है, जिसमें कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों का योगदान जमा होता है और उस पर हर साल ब्याज दिया जाता है।
मौजूदा समय में ईपीएफ पर 8.25% ब्याज मिलता है। अब EPF की ब्याज दर को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। हाल ही में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के बाद यह मुद्दा उठाया गया कि क्या इस योजना की ब्याज दर को बढ़ाकर 10% तक किया जा सकता है।
सांसद विजयकुमार उर्फ विजय वसंत ने पूछा कि क्या सरकार इस तरह के कदम पर विचार कर रही है और क्या ईपीएफओ ने इसकी व्यावहारिकता का आकलन किया है?
इस सवाल का जवाब देते हुए, श्रम और रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने संसद में एक लिखित जवाब में सरकार का पक्ष स्पष्ट किया।
10% ईपीएफ दर के लिए कोई प्रस्ताव या यूनियन की मांग नहीं
पूछे गए मुख्य सवालों में से एक यह था कि क्या श्रम यूनियनों ने औपचारिक रूप से ईपीएफ ब्याज दर को बढ़ाकर 10% करने की मांग की है।
मंत्री ने जवाब कहा, “ईपीएफओ को श्रम यूनियनों से कोई भी ऐसा आवेदन नहीं मिला है जिसमें विशेष रूप से ईपीएफ ब्याज दर को 10 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग की गई हो।”
इसका मतलब है कि अभी तक यूनियनों की ओर से इतनी बड़ी बढ़ोतरी के लिए कोई औपचारिक दबाव नहीं है।
ईपीएफओ क्या वास्तव में 10% ब्याज दे सकता है?
सांसद ने यह भी पूछा कि क्या ईपीएफओ ने कोई वित्तीय या एक्चुरियल (बीमांकिक) विश्लेषण किया है, ताकि यह पता चल सके कि 10% की दर संभव है या नहीं।
सरकार ने ऐसे किसी अध्ययन का संकेत नहीं दिया। इसके बजाय, उसने समझाया कि ईपीएफ ब्याज दरें वास्तव में कैसे तय की जाती हैं –
“ईपीएफओ द्वारा घोषित ईपीएफब्याज दर, प्रोविडेंट फंड कोष द्वारा अपने निवेशों से अर्जित वास्तविक आय पर आधारित होती है।”
यह एक महत्वपूर्ण बात है ईपीएफ दरें मनमाने ढंग से तय नहीं की जातीं। वे ईपीएफ कोष का उपयोग करके किए गए निवेशों से प्राप्त रिटर्न पर निर्भर करती हैं।
कौन तय करता है ईपीएफ की ब्याज दरें?
मंत्री ने बताया कि यह प्रक्रिया पहले से ही सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ (CBT) के जरिए इस व्यवस्था का हिस्सा है, “ईपीएफ की ब्याज दर की सिफारिश सीबीटी, ईपीएफ करता है। यह एक तीन-तरफासंस्था है, जिसमें सरकार, मालिकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।”
इसका मतलब है कि फैसले मिलकर लिए जाते हैं, न कि अकेले और ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया में सभी संबंधित लोगों की प्रतिनिधित्व पहले से ही होता है।
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नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ ही नया इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 लागू हो गया है। इस नियम ने दशकों पुराने आयकर नियम, 1962 की जगह ले ली है। इस बीच, सरकार ने असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27 के लिए सभी इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फॉर्म भी नोटिफाई कर दिए हैं, जिससे आने वाले फाइलिंग सीजन की तैयारी शुरू हो गई है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
