Explained: आपने कभी Zepto, Instamart या Blinkit से 10-15 मिनट में दूध, ब्रेड या किराने का सामान मंगाया है, तो आपके मन में भी सवाल जरूर आया होगा कि इतनी तेज डिलीवरी देने वाली कंपनियां आखिर कमाई कैसे करती हैं? ये कंपनियां कई बार भारी डिस्काउंट भी देती हैं, ऐसे में लगता है कि इन्हें फायदा कैसे होता होगा।
असल में क्विक कॉमर्स का बिजनेस मॉडल सिर्फ सामान बेचने तक सीमित नहीं है। कंपनियों की कमाई कई अलग-अलग स्रोतों से होती है। आइए जानते हैं इसके बारे में…
क्या है क्विक कॉमर्स?
अगर हम क्विक कॉमर्स को आसान भाषा में समझें तो एक ऐसा ई-कॉमर्स मॉडल है, जिसमें ग्राहकों को 10 से 20 मिनट के भीतर सामान पहुंचाने का दावा किया जाता है। इसके लिए कंपनियां शहरों में छोटे-छोटे*डार्क स्टोर बनाती हैं। इनमें पहले से हजारों जरूरी सामान स्टॉक रहता है। जैसे ही ग्राहक ऑर्डर करता है, सामान तुरंत पैक होकर नजदीकी डिलीवरी पार्टनर के जरिए भेज दिया जाता है।
कैसे करती हैं कंपनियां कमाई?
Quick Commerce बिजनेस की कमाई के प्रमुख स्रोत-
मार्केट प्लेस कमीशन
जब कोई विक्रेता क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर अपना सामान बेचता है, तो कंपनी उस बिक्री पर कमीशन लेती है। यह Quick Commerce की कमाई का एक अहम जरिया होता है।
वितरण शुल्क
ग्राहकों से हर ऑर्डर पर डिलीवरी फीस ली जा सकती है। कई बार ऑफर के तहत यह कम या शून्य भी होती है, लेकिन सामान्य स्थिति में यह भी रेवेन्यू का हिस्सा बनती है।
विज्ञापन
आपको ऐप ओपन होते ही कई ब्रांड सबसे ऊपर दिखाई देते हैं। कंपनियां इन ब्रांड्स से प्रमोशन और विज्ञापन के बदले शुल्क लेती हैं।
वेयरहाउसिंग सेवाएं
कंपनियां वेयरहाउसिंग और अन्य संबंधित सेवाओं से भी आय अर्जित करती हैं। सालाना रिपोर्ट में इसे अलग रेवेन्यू हेड के रूप में शामिल किया गया है।
कंपनियों का खर्च कहां होता है?
कमाई जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही बड़ा खर्च भी होता है। Quick Commerce में सबसे ज्यादा लागत तेज डिलीवरी बनाए रखने पर आती है।
मुख्य खर्चों में शामिल हैं-
– डार्क स्टोर चलाने का खर्च
– लास्ट-माइल डिलीवरी
– वेयरहाउस ऑपरेशन
– रिफंड
– पेमेंट गेटवे चार्ज
– कस्टमर सपोर्ट
– कैश ऑन डिलीवरी हैंडलिंग
यही वजह है कि क्विक कॉमर्स बिजनेस में केवल ज्यादा ऑर्डर होना ही काफी नहीं होता, बल्कि हर ऑर्डर से होने वाली कमाई और लागत के बीच संतुलन भी जरूरी होता है।
कैसे संभव होती है 10 मिनट में डिलीवरी?
कंपनियां पहले से तय करती हैं कि किस इलाके में किन उत्पादों की सबसे ज्यादा मांग रहती है। उसी हिसाब से नजदीकी डार्क स्टोर में स्टॉक रखा जाता है। ऑर्डर मिलते ही कुछ मिनट में पैकिंग होती है और नजदीकी डिलीवरी पार्टनर उसे लेकर निकल जाता है।
यह भी पढ़ें: Mis-selling क्या होती है? वित्तीय उत्पादों की बिक्री से जुड़े RBI के नए नियम समझिए
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और रेगुलेटेड एंटिटीज द्वारा वित्तीय उत्पादों या सेवाओं की बिक्री से जुड़े नियम कड़े कर दिए। इस कदम का उद्देश्य लेंडर्स द्वारा फाइनेंशियल प्रोडक्ट की गलत बिक्री को रोकना, गलत मार्केटिंग तरीकों पर रोक लगाना और कस्टमर की सहमति, डिस्क्लोजर और बिक्री के तरीकों के नियमों को कड़ा करना है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
