चीन की औद्योगिक क्षमता और वैश्विक बाजार में उसकी बढ़ती हिस्सेदारी को लेकर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की चिंता बढ़ती जा रही है। हाल ही में कनाडा में हुए G7 शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने Critical Minerals की सप्लाई चेन को लेकर चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए एक नया गठबंधन बनाने पर सहमति जताई।

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, G7 देशों का मानना है कि रेयर अर्थ और परमानेंट मैग्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किसी एक देश का अत्यधिक प्रभुत्व आर्थिक और रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।

इसी बहस के बीच ‘Overcapacity’ शब्द भी लगातार चर्चा में है। अमेरिका और यूरोपीय संघ लंबे समय से चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को लेकर चिंता जताते रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर Overcapacity क्या होती है और चीन का अतिरिक्त उत्पादन दुनिया के लिए चिंता का विषय क्यों बन गया है? आइए आसान भाषा में समझते हैं…

क्या होती है Overcapacity?

जब किसी देश या उद्योग की उत्पादन क्षमता उसकी वास्तविक मांग से काफी अधिक हो जाती है तो उसे Overcapacity कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, फैक्ट्रियां जितना उत्पादन कर सकती हैं, बाजार में उसकी उतनी जरूरत नहीं होती। ऐसे में अतिरिक्त उत्पाद को बेचने के लिए कंपनियां दूसरे देशों के बाजारों का रुख करती हैं।

इसे हम एक उदाहरण के तौर पर समझ सकते हैं यदि किसी देश की फैक्ट्रियां सालाना 100 लाख इलेक्ट्रिक वाहन बना सकती हैं लेकिन घरेलू मांग केवल 60 लाख वाहनों की है, तो बची हुई क्षमता Overcapacity मानी जाएगी।

चीन को लेकर चिंता क्यों है?

हाल के वर्षों में अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और अन्य विकसित देशों ने चीन की औद्योगिक क्षमता और वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी बढ़ती भूमिका को लेकर चिंता जताई है। विशेष रूप से रेयर अर्थ, परमानेंट मैग्नेट्स, बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े क्षेत्रों में चीन की मजबूत मौजूदगी चर्चा का विषय रही है।

हाल ही में G7 देशों ने Critical Minerals की सप्लाई चेन को लेकर चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए एक नया गठबंधन बनाने पर सहमति जताई। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, G7 देशों का मानना है कि रेयर अर्थ और परमानेंट मैग्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किसी एक देश का अत्यधिक प्रभुत्व आर्थिक और रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।

दुनिया के लिए यह चिंता का विषय क्यों है?

स्थानीय उद्योगों पर दबाव

जब किसी देश में कम कीमत पर बड़ी मात्रा में आयातित सामान पहुंचता है, तो स्थानीय कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है।

कीमतों में गिरावट

अतिरिक्त आपूर्ति से वैश्विक बाजारों में कीमतें नीचे आ सकती हैं। इससे उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिल सकते हैं, लेकिन उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है।

व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है

Overcapacity को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण देशों के बीच व्यापारिक विवाद भी बढ़ सकते हैं।

किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा चर्चा है?

वर्तमान में Overcapacity की चर्चा मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरियां, सोलर पैनल और स्टील जैसे क्षेत्रों में हो रही है। वहीं हाल के दिनों में Critical Minerals और Permanent Magnets की सप्लाई चेन में चीन की मजबूत स्थिति को लेकर भी G7 देशों ने चिंता जताई है।

भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

भारत इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, सोलर उपकरण और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रहा है। ऐसे में यदि वैश्विक बाजारों में सस्ते उत्पादों की आपूर्ति बढ़ती है, तो भारतीय कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा की चुनौती बढ़ सकती है।

हालांकि कुछ उद्योगों को सस्ते आयातित कच्चे माल और उपकरणों का फायदा भी मिल सकता है।

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