भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और रेगुलेटेड एंटिटीज द्वारा वित्तीय उत्पादों या सेवाओं की बिक्री से जुड़े नियम कड़े कर दिए। इस कदम का उद्देश्य लेंडर्स द्वारा फाइनेंशियल प्रोडक्ट की गलत बिक्री को रोकना, गलत मार्केटिंग तरीकों पर रोक लगाना और कस्टमर की सहमति, डिस्क्लोजर और बिक्री के तरीकों के नियमों को कड़ा करना है।

केंद्रीय बैंक ने टेक्निकल और ऑपरेशनल बदलावों की जरूरत को देखते हुए रिवाइज्ड गाइडलाइंस लागू करने की तारीख बढ़ा दी है। अब ये नियम जुलाई 2026 के बजाय 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे। आइए समझते हैं कि मिस-सेलिंग क्या होती है और वित्तीय उत्पादों की बिक्री से जुड़े RBI के नए नियम क्या हैं…

क्या होती है मिस-सेलिंग?

वित्तीय उत्पादों में ‘मिस-सेलिंग’ का मतलब है किसी ग्राहक को गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी देकर कोई वित्तीय उत्पाद या सेवा बेचना। यह स्थिति तब भी मानी जाती है, जब ग्राहक को उस उत्पाद से जुड़े रिस्क, नियम-शर्तों, शुल्क या दूसरी जरूरी जानकारियां पूरी तरह न बताई जाएं और उसे वह उत्पाद खरीदने के लिए राजी कर लिया जाए।

मिस-सेलिंग केवल गलत जानकारी देने तक सीमित नहीं है। इसमें ऐसे उत्पादों की बिक्री भी शामिल है जो ग्राहक की वास्तविक जरूरतों या वित्तीय स्थिति के अनुरूप नहीं हैं।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन बीमा पॉलिसी बेच दी जाए, जिस पर कोई आश्रित नहीं है, या किसी कम जोखिम लेने वाले ग्राहक को बिना उचित जानकारी के उच्च रिस्क वाला निवेश उत्पाद बेच दिया जाए, तो इसे मिस-सेलिंग माना जा सकता है।

RBI के नए नियम क्या हैं?

गाइडलाइंस के मुताबिक, बैंकों को कोई भी प्रोडक्ट या सर्विस देने या बेचने से पहले कस्टमर की साफ सहमति लेनी होगी और यह पक्का करना होगा कि प्रोडक्ट सही है या नहीं।

सहमति साइन किए हुए डिक्लेरेशन, ओटीपी-बेस्ड अप्रूवल, डिजिटल कन्फर्मेशन, या एग्रीमेंट में साफ तौर पर बताए गए सहमति क्लॉज के जरिए ली जा सकती है।

‘डार्क पैटर्न’ पर लगेगी रोक

आरबीआई ने डिजिटल इंटरफेस में “डार्क पैटर्न” के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है और उन्हें ऐसे डिजाइन या यूजर-एक्सपीरि4यंस टेक्नीक के तौर पर बताया है जो कस्टमर को गुमराह करते हैं या उन्हें ऐसे काम करने के लिए उकसाते हैं जो वे नहीं चाहते थे।

अगर मिस-सेलिंग साबित होती है तो क्या होगा?

आरबीआई ने कहा, “अगर किसी फाइनेंशियल प्रोडक्ट/सर्विस की मिस-सेलिंग की बात साबित होती है, तो बैंक पूरी रकम वापस करेगा… और कस्टमर को सेल कैंसिल होने की जानकारी भी देगा।”

डिजिटल एजेंट भी होंगे जिम्मेदार

आरबीआई ने कहा गया है कि प्रमोशन या कस्टमर एक्विजिशन में शामिल इन्फ्लुएंसर, एफिलिएट, लोन सर्विस प्रोवाइडर और दूसरे डिजिटल मार्केटिंग इंटरमीडियरी को डायरेक्ट सेलिंग एजेंट या डायरेक्ट मार्केटिंग एजेंट माना जाएगा और रेगुलेटेड एंटिटी अपने कामों के लिए जिम्मेदार रहेंगी।

इंसेंटिव सिस्टम पर भी सख्ती

RBI ने कर्मचारी इंसेंटिव पर साफ किया कि थर्ड पार्टी रेगुलेटेड एंटिटी के कर्मचारियों को इंसेंटिव नहीं दे सकतीं, लेकिन ऐसी एंटिटी अपने स्टाफ को इंसेंटिव दे सकती हैं।

RBI ने आगे कहा कि इस प्रोविजन का मकसद यह पक्का करना है कि इंसेंटिव स्ट्रक्चर से एग्रेसिव सेल्स प्रैक्टिस या प्रोडक्ट की मिस-सेलिंग न हो।

ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?

नए नियम लागू होने के बाद ग्राहकों के लिए वित्तीय उत्पादों की तुलना करना और उनकी शर्तों को समझना आसान हो सकता है। बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को उत्पाद से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी अधिक पारदर्शी तरीके से साझा करनी होगी, जिससे ग्राहकों के भ्रमित होने की संभावना कम होगी।

साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भ्रामक डिज़ाइन और आक्रामक बिक्री के तरीकों पर रोक लगने से ग्राहकों पर अनावश्यक दबाव नहीं बनेगा।

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भारत में डिजिटल भुगतान की बात हो तो सबसे पहले यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface -UPI) का नाम आता है। यह एक रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जो आपके कई बैंक खातों को एक ही मोबाइल एप्लिकेशन (जैसे Google Pay, PhonePe, Paytm आदि) में जोड़ता है। जिसके जरिए आसानी से भुगतान किया जा सकता है।

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के इस प्लेटफॉर्म ने देश में डिजिटल लेनदेन को आसान बना दिया है। UPI के व्यापक उपयोग के बीच RBI डिजिटल रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दोनों में क्या अंतर है और केंद्रीय बैंक डिजिटल रुपये पर इतना जोर क्यों दे रहा है। यहां पढ़ें पूरी खबर…