भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में FCNR(B) डिपॉजिट्स के लिए एक विशेष स्वैप सुविधा शुरू की है। इस फैसले के बाद FCNR(B) फिर चर्चा में आ गया है। रिजर्व बैंक को उम्मीद है कि इस कदम से देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा और रुपये को सहारा मिलेगा।

लेकिन FCNR(B) Deposit आखिर होता क्या है और RBI ने इसे लेकर यह कदम क्यों उठाया है? आइए आसान भाषा में समझते हैं…

क्या है FCNR(B) Deposit?

FCNR(B) यानी विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा एक निश्चित अवधि (Fixed-Term) की बैंक जमा योजना है, जिसे अनिवासी भारतीय (NRI), ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) और भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) भारत में खोल सकते हैं।

इस योजना की खास बात यह है कि इसमें जमा राशि को रुपये में बदलने की जरूरत नहीं होती। खाताधारक अपनी बचत को अमेरिकी डॉलर, पाउंड स्टर्लिंग, यूरो, जापानी येन, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और कनाडाई डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं में ही जमा रख सकते हैं।

FCNR(B) डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज भारत में आयकर से मुक्त होता है, बशर्ते खाताधारक भारतीय कर कानूनों के तहत अनिवासी (Non-Resident) की श्रेणी में आता हो। वहीं, मौजूदा नियमों के तहत बैंक इन जमाओं पर अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क दरों से जुड़ी ब्याज दरें ऑफर कर सकते हैं।

रिजर्व बैंक ने क्यों उठाया ये कदम?

RBI ने बैंकों को 30 सितंबर 2026 तक नई FCNR(B) जमा राशि पर रियायती डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा देने का फैसला किया है। इसका मकसद विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भारतीय बैंकों में ज्यादा विदेशी मुद्रा जमा करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

दरअसल, वैश्विक अनिश्चितता और बढ़ती डॉलर मांग के बीच RBI विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना चाहता है। ऐसे में FCNR(B) एक प्रभावी माध्यम माना जा रहा है।

कैसे मिलती है रुपये को मजबूती ?

जब NRI बड़ी मात्रा में डॉलर या अन्य विदेशी मुद्राएं भारतीय बैंकों में जमा करते हैं, तो बैंकिंग प्रणाली में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ता है।

इससे कई फायदे होते हैं:

– विदेशी मुद्रा भंडार को समर्थन मिलता है।
– डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है।
– बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता मजबूत होती है।

इसका मत FCNR(B) सीधे रुपये की कीमत नहीं बढ़ाता, लेकिन देश में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाकर रुपये को स्थिर रखने में मदद करता है।

2013 में भी लाई गई थी ऐसी योजना

FCNR(B) स्वैप योजना पहली बार 2013 में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की गई थी। उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों को लेकर बाजार में उथल-पुथल थी और रुपये पर भारी दबाव था।

जनसत्ता के सहयोगी द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन RBI गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल में शुरू की गई इस योजना के जरिए करीब 26 अरब डॉलर का प्रवाह हुआ था।

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भारत में लोग अब अपने बैंक खातों में पैसा रखने का तरीका बदल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच सालों में बड़ी संख्या में जमाकर्ताओं ने कम ब्याज वाले सेविंग्स अकाउंट से पैसा निकालकर अधिक रिटर्न देने वाले टर्म डिपॉजिट (FD) में लगाना शुरू कर दिया है। इससे देश में बैंक डिपॉजिट की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।

आरबीआई ने कहा कि कुल बैंक डिपॉजिट में सेविंग्स डिपॉजिट का हिस्सा मार्च 2022 के 34.6 फीसदी से तेजी से घटकर मार्च 2026 में 28.7 फीसदी हो गया, जो बढ़ते ब्याज दर के माहौल में डिपॉजिट करने वालों की बदलती पसंद को दिखाता है। यहां पढ़ें पूरी खबर…